Sonam Wangchuk Arrest Case : नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका) के तहत जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) की गिरफ्तारी को चुनौती देने संबंधी उनकी पत्नी गीतांजलि जे. अंगमो की याचिका पर सुनवाई सोमवार को 26 फरवरी तक के लिए टाल दी। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी. बी. वराले की पीठ ने मामले की सुनवाई सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की अनुपलब्धता की वजह से टाली। इससे पहले, न्यायालय ने केंद्र से सवाल किया था कि क्या सोनम वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उनकी हिरासत पर सरकार द्वारा पुनर्विचार करने की कोई संभावना है।
उच्चतम न्यायालय में सोनम वांगचुक केस की सुनवाई टली
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज ने दलील दी थी कि वांगचुक पिछले साल 24 सितंबर को लेह में हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार थे, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी और 161 लोग घायल हुए थे। केंद्र सरकार और लद्दाख प्रशासन ने उच्चतम न्यायालय को बताया था कि वांगचुक को सीमावर्ती क्षेत्र में लोगों को उकसाने के आरोप में हिरासत में लिया गया हैं क्योंकि इसमें क्षेत्रीय संवेदनशीलता का मामला शामिल है। वांगचुक की हिरासत को उचित ठहराते हुए मेहता ने पीठ को बताया कि रासुका के तहत उन्हें निरुद्ध करने का आदेश देते समय सभी प्रक्रियात्मक एहतियाती उपायों का पालन किया गया था।

रासुका कार्रवाई पर कानूनी जंग तेज, वांगचुक बोले- विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार
रासुका, केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसे व्यक्तियों को हिरासत में लेने का अधिकार देता है, जिन्हें भारत की सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियां करने से रोके जाने की आवश्यकता हो। अधिकतम हिरासत अवधि 12 महीने है, हालांकि इसे पहले भी रद्द किया जा सकता है। केंद्र सरकार ने दलील दी थी कि वांगचुक ने ‘जेन जेड’ को नेपाल और बांग्लादेश जैसे विरोध प्रदर्शनों के लिए उकसाने की कोशिश की। ‘जेन जेड’ उन लोगों को कहा जाता है जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है। मेहता ने अदालत में यह दावा भी किया कि वांगचुक ने अरब क्रांति जैसे आंदोलन का भी जिक्र किया था, जिसके कारण अरब जगत के कई देशों में सरकारें गिर गईं थीं।
वर्तमान में जोधपुर केंद्रीय कारागार में बंद वांगचुक ने 29 जनवरी को उन आरोपों का खंडन किया कि उन्होंने अरब क्रांति की तरह सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए कोई बयान दिया था। जलवायु कार्यकर्ता ने रेखांकित किया कि उन्हें आलोचना और विरोध करने का लोकतांत्रिक अधिकार है। वांगचुक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि पुलिस ने हिरासत में लेने वाले प्राधिकार को गुमराह करने के लिए चुनिंदा वीडियो का इस्तेमाल किया। अंगमो ने सोनम वांगचुक की हिरासत को अवैध और उनके मौलिक अधिकारों का हनन करने वाली मनमानी कार्रवाई बताया है। वांगचुक को लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों के दो दिन बाद बाद 26 सितंबर को हिरासत में लिया गया था।




