प्रतीक चौवे, संपादक
टैक्स चोरी का खेल ‘रुक’ नहीं पा रहा। हर कोई सरकार को लाखों-करोड़ों की चपत लगा रहा है। कभी-कभार किए जाने वाले एक्शन से यह जताया जाता है कि विभाग पूरी तरह इसको लेकर सजग है। हकीकत में ऐसा नहीं है। हाल ही में जयपुर के प्रसिद्ध कान्हा रेस्टोरेंट चेन पर आयकर विभाग ने बड़ी कार्रवाई की है। आयकर विभाग ने 6 शहरों में 33 ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। सबसे ज्यादा तलाशी जयपुर में करीब 26 स्थानों पर हुई। दस्तावेज, बैंक खातों व कंप्यूटर डेटा की जांच की गई। 100 करोड़ से अधिक की टैक्स चोरी का शक जताया जा रहा है। यह तो वो मामला है जो पकड़ में आ गया, न जाने कितनी जगह यह चोरी जारी है।
एक ऐसा ही मामला हैदराबाद के बिरयानी रेस्टोरेंट का पकड़ में आया। एआई की मदद से करीब सत्तर हजार करोड़ का बिरयानी टैक्स पकड़ा गया। ये छापे यदा-कदा पड़ते हैं, बाकी देशभर में हो रही टैक्सी चोरी पर कोई ध्यान नहीं दे रहा। कराेड़ों की रोजाना बिक्री तो गुटखा-पान मसाले जैसे उत्पादों की होती है पर टैक्स के नाम पर जीरो। देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कर व्यवस्था होती है, लेकिन जब टैक्स चोरी लगातार बढ़ती दिखाई दे और कार्रवाई यदा-कदा तक सीमित रह जाए, केवल कुछ को टार्गेट किया जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है। या तो निगरानी तंत्र बेहद कमजोर है, या फिर कहीं न कहीं मिलीभगत की गुंजाइश से इनकार नहीं किया जा सकता।
यदि सिस्टम समय पर सतर्क हो, तो इतने बड़े स्तर पर कर चोरी पनप ही नहीं सकती। जब नियम सख्त हैं, तकनीक उपलब्ध है और निगरानी तंत्र मौजूद है, तब भी यदि बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां पकड़ में आती हैं, तो समस्या केवल व्यक्तियों की नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की कमजोरियों की ओर इशारा करती है। किसी बड़े घोटाले या टैक्स चोरी का मामला सामने आता भी है, तो प्रायः कार्रवाई केवल कारोबारियों तक सीमित रह जाती है। सिस्टम के भीतर संभावित लापरवाही या मिलीभगत की गहराई से जांच कम ही होती है।
जब व्यवस्था के भीतर जिम्मेदारी तय नहीं होती, तो न तो सुधार की प्रेरणा बनती है और न ही भय का माहौल। विभागों के बीच समन्वय बढ़ाना भी जरूरी है। आयकर, जीएसटी, बैंकिंग और कॉर्पोरेट डाटाबेस यदि एकीकृत रूप से काम करें, तो फर्जी बिलिंग, शेल कंपनियों और बेनामी लेनदेन पर तेजी से रोक लगाई जा सकती है। जब बड़े मामलों में वर्षों तक गड़बड़ी चलती रहती है, तो यह मानना कठिन होता है कि निगरानी पूरी तरह सतर्क थी। विभागों को आंतरिक ऑडिट मजबूत करना होगा और जहां लापरवाही या मिलीभगत मिले, वहां संबंधित अधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई करनी होगी। व्यवस्था के भीतर जवाबदेही तय होगी तो बाहर अनुशासन अपने आप बढ़ेगा।




