प्रतीक चौवे, संपादक
मानसरोवर और इसके आसपास का इलाका आज जयपुर के सबसे तेजी से फैलते शहरी क्षेत्रों में शामिल है। पिछले कुछ वर्षों में यहां सैकड़ों नई कॉलोनियां बस गईं। मकान खड़े हो गए, फ्लैट भर गए, आबादी कई गुना बढ़ गई, लेकिन सरकारी सुविधाएं वहीं की वहीं रह गईं। यह विकास नहीं, बल्कि योजनाहीन विस्तार का जीता-जागता उदाहरण है। कई नई कॉलोनियां आज भी टैंकरों पर निर्भर हैं। सीवरेज नेटवर्क अधूरा है, बरसात में जलभराव आम हो जाता है। कचरा प्रबंधन आबादी के अनुपात में बहुत पीछे है। पार्क हैं, लेकिन उनका सौंदर्यीकरण और रखरखाव नहीं। बच्चों के खेल मैदान, बुजुर्गों के लिए सुरक्षित वॉकिंग ट्रैक और सामुदायिक स्थल—इन सबकी भारी कमी है।
कॉलोनियां बनीं, लेकिन सुकून की जगह नहीं। इतनी बड़ी आबादी के बावजूद एक भी बड़ा सरकारी मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल नहीं। लोगों को गंभीर इलाज के लिए अब भी एसएमएस, आरयूएचएस या निजी अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ता है। गरीब और मध्यम वर्ग के लिए इलाज आज भी महंगा और दूर की चीज बना हुआ है।मानसरोवर निजी कॉलेज और कोचिंग का गढ़ बन गया है, लेकिन सरकारी कॉलेज और विश्वविद्यालय का मजबूत नेटवर्क नहीं। यह शिक्षा के निजीकरण की तस्वीर है—जहां पढ़ाई है, लेकिन सबके लिए सुलभ नहीं। कोचिंग समय में सड़कें जाम, पार्किंग का अभाव और सार्वजनिक परिवहन की कमी लोगों को परेशान किए हुए है। मेट्रो है, लेकिन वहां तक जाने अथवा वहां से तय जगह पहुंचने के लिए साधन कम हैं।
ई-रिक्शा के अलावा अन्य साधन मुंह मांगे पैसे मांगते हैं। मानसरोवर आज जयपुर का सबसे बड़ा शहरी विस्तार क्षेत्र है, लेकिन सुविधाओं के मामले में आज भी शहर के पुराने हिस्सों से पीछे है। सवाल यह भी है कि क्या मानसरोवर क्षेत्र के पार्षदों ने निगम बैठकों में अपने वार्ड की समस्याएं पूरी मजबूती से उठाईं? बजट में अस्पताल, पार्क और सड़क के लिए ठोस प्रस्ताव रखे? अधिकारियों से जवाब मांगा? स्थानीय लोगों में यह धारणा गहराती जा रही है कि कई पार्षद जनहित से ज्यादा ठेके और फाइलों में रुचि लेते रहे।
नालियां बनीं, सड़कें बनीं—लेकिन गुणवत्ता ऐसी कि एक-दो बारिश में ही सब बह गया। मानसरोवर ही नहीं पत्रकार कॉलोनी के आसपास का इलाका अब भी समस्याओं से जूझ रहा है। पत्रकार कॉलोनी बसे बीस साल हो गए पर अब तक सीवरेज लाइन तक नहीं डाली गई। मानसरोवर से सांगानेर-सोढ़ाला, पत्रकार कॉलोनी के आसपास के इलाके में हजारों परिवार रहते हैं पर अब भी वे रोजमर्रा की सुविधाएं नहीं मिल पाने से परेशान हैं। मजे की बात यह कि सीएम का विधानसभा क्षेत्र है और डिप्टी सीएम का तो घर भी। आखिर क्यों विकास-सुविधाएं सबको मुहैया नहीं हो पा रहीं। मानसरोवर की समस्या संसाधनों की कमी नहीं, प्राथमिकताओं की गड़बड़ी है। अब वक्त आ गया है कि प्रशासन कॉलोनियों की संख्या गिनने के बजाय यह गिने कि वहां रहने वालों को क्या मिल रहा है। जनता की मुश्किलें दूर होनी चाहिएं, जिम्मेदारी-जवाबदेही के साथ। वोट लेते समय घर-घर जाने वाले पार्षद चुनाव जीतने के बाद पब्लिक का फोन तक नहीं उठाते जो वाकई गंभीर बात है।




