West Bengal SIR : कोलकाता। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एआईआर) के तहत बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद मतुआ समुदाय बहुल इलाकों में घबराहट, गुस्सा और संदेह का माहौल बन गया है। इस मुद्दे ने भाजपा को अपने गढ़ में रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है, जबकि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को राजनीतिक अवसर नजर आने लगा है। वर्ष 2002 के बाद पहली बार हो रहे इस व्यापक पुनरीक्षण ने सीमा से सटे जिलों की पुरानी चिंताओं को फिर से जगा दिया है। मतुआ, अनुसूचित जाति का हिंदू शरणार्थी समुदाय है और दक्षिण बंगाल में उत्तर 24 परगना तथा नदिया जिलों तथा उत्तर बंगाल के कुछ हिस्सों सहित राज्य की लगभग 50 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखता है। यह समुदाय पहचान, दस्तावेज और नागरिकता को लेकर नयी आशंकाओं में घिर गया है।
मतुआ इलाकों में नाम कटने से बढ़ा सियासी घमासान
एसआईआर नियमों के तहत जिन मतदाताओं के नाम 2002 की मतदाता सूची में नहीं थे, उन्हें पात्रता से जुड़े दस्तावेज देने को कहा गया। लेकिन दशकों से बांग्लादेश से आए लाखों लोगों के पास औपचारिक कागजात नहीं हैं, जिसके कारण उनके नाम सूची से हटाए जाने लगे हैं और कई लोग मताधिकार खोने के डर से जूझ रहे हैं। आंकड़े भी इस प्रक्रिया के व्यापक प्रभाव को दिखाते हैं। दूसरे चरण में दबग्राम-फुलबाड़ी में 16,491, बगदा में 15,303 और कल्याणी में 9,037 नाम हटाए गए। इससे पहले पहले चरण में बगदा में 24,927, गैघाटा में 16,718, बनगांव-उत्तर में 26,183 और बनगांव-दक्षिण में 18,562 नाम हटाए गए थे। ताजा आंकड़ों के बाद बगदा में कुल 40,230, बनगांव-उत्तर में 34,109, बनगांव-दक्षिण में 25,464 और गैघाटा में 23,488 नाम हट चुके हैं। पूरे राज्य में नवंबर से अब तक करीब 63.66 लाख नाम, यानी कुल मतदाताओं के लगभग 8.3 प्रतिशत नाम, सूची से हटाए जा चुके हैं। इसके साथ ही लगभग 60 लाख मतदाता ‘विचाराधीन’ श्रेणी में हैं।

निर्वाचन आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया फर्जी, मृत और अयोग्य मतदाताओं को हटाने के लिए है, लेकिन मतुआ क्षेत्रों में यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है।मतुआ महासंघ के महासचिव महितोष बैद्य ने कहा कि समुदाय में ‘‘भ्रम और चिंता’’ का माहौल है और बड़ी संख्या में लोगों के नाम सूची से हट गए हैं। वहीं, केंद्रीय मंत्री और बनगांव से भाजपा सांसद शांतनु ठाकुर ने समुदाय को आश्वस्त करते हुए कहा कि जिन मतुआ शरणार्थियों के नाम हटे हैं, उन्हें नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के तहत भारतीय नागरिकता मिलेगी और उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस सांसद ममताबाला ठाकुर ने आरोप लगाया कि 2002 के बाद आए और दस्तावेज़ न रखने वाले मतुआ लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
भाजपा के लिए मतदाता सूची से नाम हटाने का यह मामला एक बड़ा राजनीतिक दांव बन गया है : या तो वह नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के मुद्दे को और जोर से उठाते हुए भविष्य में नाम बहाल कराने का भरोसा दिलाए या फिर उस शरणार्थी वोट बैंक को नाराज़ करने का जोखिम उठाए जिसने 2019 के बाद पार्टी के राज्य में आगे बढ़ने में अहम भूमिका निभाई थी। वहीं तृणमूल कांग्रेस के लिए यह स्थिति शरणार्थी वोटों को दोबारा अपने पक्ष में लाने का अवसर दे सकती है, लेकिन इसके साथ ही उसे सीमा से लगे उन जिलों में बढ़ती चिंता और असुरक्षा की भावना को संभालने की चुनौती भी झेलनी पड़ेगी, जहां पहचान की राजनीति गहराई से जुड़ी हुई है। विधानसभा चुनाव से महज दो महीने पहले मतुआ बहुल क्षेत्र अब बंगाल की राजनीति का सबसे संवेदनशील और निर्णायक चुनावी केंद्र बन गया है, जहां मतदाता सूची से हर नाम की कटौती एक नए राजनीतिक विवाद और टकराव को जन्म दे रही है।




