प्रतीक चौवे, संपादक
इस बार गर्मी समय से पहले आ गई है। तेज गर्मी पड़ने की संभावना मौसम विशेषज्ञ भी जता रहे हैं। बदलते मौसम में बढ़ती बीमारियां फिर चिकित्सा इंतजाम पर सवाल खड़े कर रही है। मई-जून से हालात अभी से दिखने लगे हैं। इस साल गर्मी का असर सामान्य नहीं रहने वाला, मार्च से ही तापमान तेज रफ्तार पकड़ रहा है और मई तक हालात बेहद गंभीर हो सकते हैं। ऐसा हम नहीं मौसम विभाग कह रहा है। बाड़मेर-जैसलमेर में दिन का तापमान चालीस डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच चुका है। आशंका तो यह भी जताई जा रही है कि मई-जून में हो सकता है कि प्रदेश के कई स्थानों पर अधिकतम तापमान पचास डिग्री सेल्सियस से भी अधिक रिकॉर्ड हो।
मतलब साफ है कि इस बार गर्मी भीषण पड़ेगी और बीमारियां ज्यादा से ज्यादा फैलेगी, सो अलग। इसके चलते जाहिर सी बात है कि सरकार को इंतजाम तो पुख्ता कर ही लेने चाहिएं। बावजूद इसके कहीं भी ऐसा दिख नहीं रहा। कई अस्पताल-डिस्पेंसरियों में आने वाले मरीज को छाया तक नहीं मिल पा रही। चिकित्सक तक खुद बताने लगे हैं कि लू, डिहाइड्रेशन, उल्टी-दस्त, वायरल बुखार और त्वचा संबंधी समस्याएं भी इस तेज गर्मी में बढ़ेंगी। यह भी सच है कि गर्मी से पहले बचाव-राहत ही नहीं जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने चाहिएं पर इसका भी किसी को ध्यान नहीं है। पेयजल की व्यवस्था भी गर्मी के मौसम में बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। कई जगह पानी की कमी के कारण लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हो जाते हैं, जिससे बीमारियों का खतरा और बढ़ जाता है। इसलिए जलदाय विभाग को भी समय रहते पानी की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी।
नगर निकायों को साफ-सफाई और कचरा प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि गंदगी और ठहरा हुआ पानी कई तरह की बीमारियों को जन्म देता है। यदि समय रहते इन व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाए तो गर्मी के मौसम में फैलने वाली कई बीमारियों को काफी हद तक रोका जा सकता है। राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग हर साल गर्मी के मौसम को देखते हुए विशेष तैयारियां करने का दावा करते हैं। सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में ओआरएस, जरूरी दवाइयों और डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जाते हैं। लू से बचाव के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से एडवाइजरी भी जारी की जाती है, जिसमें लोगों को दोपहर की तेज धूप से बचने, ज्यादा पानी पीने और हल्का भोजन करने की सलाह दी जाती है। इसके बाद भी अधिकांश अस्पताल-डिस्पेंसरी में व्यवस्था ठीक हो पाती है न ही लोग जागरूक रहकर इन नियमों की पालना कर पाते हैं।
बदलते जमाने का असर तो सबको पता है कि पग-पग पर लगने वाली प्याऊ तक गायब हो गईं, छाया के लिए पेड़ ढूंढना अब रेत के ढेर में सुई खोजने जैसा हो गया। न पानी न पर्यावरण और उस पर बीमारी के बाद उपचार में भी कई तरह की परेशानियां। आखिर ऐसा हो क्यों रहा है, इस पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। इंतजाम के दावों की पोल तो तब ही खुल जाती है जब सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में गर्मी कम करने के लिए न तो पंखे चलते मिलते हैं न ही ठंडे पानी की कोई व्यवस्था। अस्पतालों में भी कई तरह की खामियां मरीजों के लिए परेशानी और बढ़ाती हैं। ऐसे में अभी गर्मी शुरू हुई है, इसके तेवर तीखे हों, इससे पहले ही सरकार को अपने इंतजाम संभालने चाहिए। अव्यवस्था के चलते किसी की जान जाने पर जांच कमेटी गठित कर देने भर से काम नहीं चलने वाला। जन-जन का ध्यान रखना सरकार की पहली जिम्मेदारी है। इसके लिए स्थानीय नेताओं को भी जागना होगा, केवल खुद के सम्मान कराने या अखबार में बयान छपवा लेने से जनता की मुश्किल दूर नहीं होने वाली।




