नई दिल्ली। (आलोक शर्मा) मिडिल ईस्ट एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। हाल ही में Iran के जवाबी हमलों को लेकर ऐसे दावे सामने आए हैं कि खाड़ी क्षेत्र में मौजूद United States के सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचा है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि हर मामले में स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतना तय है कि इस घटनाक्रम ने क्षेत्रीय सुरक्षा और अमेरिकी रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि दशकों से अमेरिका ने खाड़ी देशों को सुरक्षा का भरोसा देकर अपने सैन्य अड्डे वहां स्थापित किए। इन ठिकानों का उद्देश्य था संभावित खतरों को दूर रखना और क्षेत्र में संतुलन बनाए रखना। लेकिन यदि ये ठिकाने खुद हमलों के निशाने पर आ जाएं, तो उनकी उपयोगिता और विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यही कारण है कि अब चर्चा इस बात की हो रही है कि क्या ये बेस सुरक्षा देने के बजाय नए खतरे पैदा कर रहे हैं।
कुछ रिपोर्ट्स और विश्लेषणों में यह भी कहा गया कि हमलों के दौरान अमेरिकी सैनिकों को पीछे हटना पड़ा या अस्थायी रूप से स्थान बदलना पड़ा। इसे लेकर विरोधी पक्ष इसे भागना या कायरता बताकर प्रचारित करने में कोई कमी नहीं छोड रहे वहीं अमेरिकी समर्थक इसे सैन्य रणनीति में “टैक्टिकल रिट्रीट” यानी रणनीतिक वापसी एक सामान्य प्रक्रिया बता रहे हैं, जिसका मकसद नुकसान को कम करना और दोबारा संगठित होना होता है। इसलिए इसे सीधे तौर पर कमजोरी मान लेना पूरी तस्वीर नहीं दर्शाता।
फिर भी, इस पूरे घटनाक्रम ने अमेरिका की मध्य पूर्व नीति को झकझोर दिया है। पहली बार ऐसा महसूस किया जा रहा है कि अत्याधुनिक तकनीक और मजबूत सैन्य उपस्थिति के बावजूद अमेरिका पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। इससे खाड़ी देशों के मन में भी यह सवाल उठ सकता है कि क्या अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पहले जितनी भरोसेमंद है।
भविष्य की बात करें तो इसके कई संभावित असर हो सकते हैं। सबसे पहला, अमेरिका अपनी सैन्य रणनीति में बदलाव कर सकता है, जैसे बड़े स्थायी बेस की जगह छोटे और मोबाइल यूनिट्स पर जोर देना। दूसरा, खाड़ी देश अपनी सुरक्षा के लिए वैकल्पिक साझेदारों की तलाश कर सकते हैं या खुद की सैन्य क्षमता बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान देंगे। तीसरा, क्षेत्र में तनाव और अस्थिरता बढ़ने का खतरा भी बना रहेगा, क्योंकि शक्ति संतुलन में बदलाव अक्सर नए संघर्षों को जन्म देता है।
अंततः, यह घटना सिर्फ एक सैन्य टकराव नहीं, बल्कि एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव का संकेत हो सकती है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका अपनी रणनीति को नए सिरे से गढ़ता है या फिर मिडिल ईस्ट में उसकी पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है।



