संपादक : प्रतीक चौवे
जयपुर। भ्रूण लिंग परीक्षण का धंधा जोरों पर चल रहा है। राजधानी जयपुर में डॉक्टर समेत तीन जने गिरफ्तार कर लिए गए। डिकॉय ऑपरेशन के जरिए समय-समय पर होने वाली कार्रवाई के बाद भी भ्रूण लिंग परीक्षण का काम बंद नहीं हो रहा। कार्रवाई गिनी-चुनी होती हैं और डॉक्टरों को कोई विशेष सजा भी नहीं हो रही, ऐसे में इसे पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं हो पा रहा। भारत में लिंग जांच पर सख्त प्रतिबंध है, ताकि बेटियों के खिलाफ भेदभाव और भ्रूण हत्या रोकी जा सके। ऐसे मामलों में पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत कड़ी सजा और लाइसेंस रद्द तक हो सकता है। लगातार डिकॉय ऑपरेशन होने के बावजूद भ्रूण लिंग जांच का नेटवर्क सक्रिय है।
हालिया मामलों में भी डॉक्टर और दलालों की गिरफ्तारी बताती है कि यह संगठित कारोबार है। डिकॉय ऑपरेशन में पकड़े गए हर डॉक्टर को तुरंत निलंबित नहीं किया जाता। कई मामलों में पहले केस दर्ज होता है, फिर जांच/कोर्ट प्रक्रिया। उसके बाद निलंबन या लाइसेंस रद्द होता है। आज भी कई घरों में पहला सवाल यही होता है—“बेटा है या बेटी? अधिकतर लोग बेटा ही चाहते हैं और यही सोच भ्रूण परीक्षण को बढ़ा रही है। यह सोच सिर्फ अशिक्षित या गरीब तबके तक सीमित नहीं है। शहरों में, पढ़े-लिखे और संपन्न परिवारों में भी। इसी मानसिकता के कारण अवैध लिंग जांच का पूरा नेटवर्क पनपता है।
जब परिवार खुद डॉक्टर के पास जाकर पूछता है—लड़का है या लड़की?” तो वह भी इस गैरकानूनी काम के लिए तैयार हो जाता है। यही कारण है कि लिंगानुपात बिगड़ रहा है, बेटियों की संख्या घटती जा रही है।कानून अपराध को रोक सकता है, लेकिन सोच को नहीं बदल सकता। डिकॉय ऑपरेशन होते हैं, डॉक्टर पकड़े जाते हैं, कानून का डंडा चलता है—फिर भी अगर बेटियों की हत्या नहीं रुक रही, तो साफ है कि बीमारी बाहर नहीं, भीतर है। तुरंत सजा से ही डर बढ़ सकता है। डिकॉय ऑपरेशन के बाद तुरंत लाइसेंस सस्पेंड हो तो 6 महीने के भीतर फैसला अनिवार्य हो।
दोषी डॉक्टर पर स्थाई प्रतिबंध लगाया जाए। लोगों को भी इसके लिए जागरूक होना पड़ेगा। आसपास ऐसे किसी क्लिनिक-अस्पताल की जानकारी को तुरंत बताया जाए। लोगों को समझाया भी जाए कि बेटा-बेटी बराबर हैं, इनमें भेद करना भी बड़ा अपराध है।कानून सख्त और तेज हो, सिस्टम ईमानदारी से काम करे। समाज अपनी सोच बदले ताकि यह अपराध पूरी तरह खत्म हो। यही नहीं ऐसे मामलों की संख्या भी बढ़नी चाहिए, एक अनुमान के मुताबिक हर साल पूरे प्रदेश में तीस-चालीस मामले ही ऐसे होते हैं जबकि लोगों को आगे बढ़कर ऐसे चिकित्सकों को पकड़ाना चाहिए।




