Police Behaviour: खाकी के व्यवहार में सुधार की उम्मीद कब हो पाएगी पूरी

    पुलिस के व्यवहार में सुधार की उम्मीद अभी अधूरी है। बार-बार निर्देश और नसीहतों के बावजूद जमीन पर बदलाव सीमित दिखता है। कई मामलों में फरियादियों से भी अपमानजनक व्यवहार और अनावश्यक बल प्रयोग सामने आता है, जिससे पुलिस की छवि प्रभावित होती है। सुधार के लिए केवल आदेश नहीं, बल्कि सख्त पालन, जवाबदेही और संवेदनशीलता अपनाने की जरूरत है।

    0
    47
    Image Source: AI

    आम पब्लिक के साथ पुलिस के व्यवहार को कौन नहीं जानता। मोती डूंगरी इलाके में तो मामूली पार्किंग को लेकर महिला एसआई एक कांस्टेबल से भिड़ गई। धक्का-मुक्की कर तमाशा बना सो अलग। असल में यह तो दोनों पुलिसकर्मी थे तब यह हाल था यदि कोई आम आदमी होता तो उसकी क्या गत होती, यह सब जानते ही हैं। खाकी अपने व्यवहार को लेकर हमेशा विवादों में रही है। आरोपी तो छोड़िए यहां फरियादी तक से थाने में ठीक ढंग से बात नहीं की जाती। उसके साथ भी ऐसा व्यवहार किया जाता है कि मानों वो कोई अपराध कर थाने में आया हो। यातायात नियमों में जरा सी चूक पर ट्रेफिक पुलिसकर्मी हाथापाई पर उतर आते हैं। बात-विवाद कोई भी हो, खाकी अपनी धौंस जमाने से नहीं चूकती। ऐसा नहीं है कि सभी पुलिसकर्मी ऐसे हैं पर जो हैं उनकी कारगुजारी की शर्मिंदगी पूरे विभाग को झेलनी पड़ती है। बरसों से समय-समय पर पुलिस के आला अधिकारी ही नहीं मंत्री तक पुलिस को अपने व्यवहार में सुधार लाने की सीख देते रहे हैं। थानों में स्वागत कक्ष भी बनवाए गए ताकि यहां आने वाले हर फरियादी को सम्मान मिल सके, वो अपनी बात-पीड़ा आराम से रख सके। समय-समय पर अदालत भी पुलिस को अपना व्यवहार सुधारने की सीख देती रहती हैं।

    पुलिस का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखने का है पर जबरन जरा-जरा सी बात पर सरे राह किसी का अपमान करना उसकी ड्यूटी नहीं है। पुलिस व्यवस्था में सुधार को लेकर समय-समय पर शीर्ष स्तर से निर्देश और नसीहतें जारी होती रहती हैं। पुलिस महानिदेशक स्तर के अधिकारी भी लगातार यह कहते नजर आते हैं कि खाकी का व्यवहार जनता के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, अनावश्यक बल प्रयोग से बचना चाहिए और कानून का पालन करते हुए संवाद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये निर्देश जमीन पर पूरी तरह लागू हो पा रहे हैं? परिपत्रों और समीक्षा बैठकों में पुलिस के व्यवहार सुधारने की बात दोहराई जाती है। जनता से शालीनता से पेश आने, शिकायतों को गंभीरता से सुनने और दबाव की बजाय विश्वास का माहौल बनाने की सलाह दी जाती है। बावजूद इसके, कई घटनाएं बताती हैं कि व्यवहार में अपेक्षित बदलाव अभी भी अधूरा है। इससे यह संकेत मिलता है कि केवल निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनकी सख्ती से पालना सुनिश्चित करना भी जरूरी है। जब शीर्ष अधिकारी सुधार की बात करते हैं तो उसका असर नीचे तक दिखना चाहिए। थानों और चौकियों में आमजन का अनुभव ही पुलिस की असली छवि बनाता है। यदि वहीं पर कठोरता, अनावश्यक दबाव या अपमानजनक व्यवहार जारी रहे, तो सुधार के संदेश केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं।

    पुलिस को यह समझना होगा कि वह जनता की सेवक है, शासक नहीं। कानून लागू करने के नाम पर अनावश्यक बल प्रयोग, मारपीट, धमकी या अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। कई बार छोटे विवादों या सामान्य पूछताछ में भी बलपूर्वक कार्रवाई की शिकायतें सामने आती हैं, जिससे निर्दोष लोग भी मानसिक और सामाजिक पीड़ा झेलते हैं। ऐसी घटनाएं पुलिस की छवि को धूमिल करती हैं। पुलिस-जनता संबंध बेहतर होंगे तो अपराध नियंत्रण भी आसान होगा। लोग सहयोग करेंगे, जानकारी देंगे और कानून व्यवस्था बनाए रखने में साझेदार बनेंगे। आज जरूरत है कि पुलिस अपने व्यवहार में संवेदनशीलता और संयम अपनाए। प्रशिक्षण के दौरान भी संवाद कौशल, मानवाधिकार और तनाव प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। यदि पुलिस शांतिपूर्ण ढंग से समझाइश और कानूनी प्रक्रिया का पालन करे, तो अधिकांश स्थितियां बिना टकराव के हल हो सकती हैं। बल प्रयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए, वह भी केवल अत्यंत आवश्यक परिस्थितियों में। इसके साथ ही जवाबदेही तय करना भी जरूरी है। यदि किसी पुलिसकर्मी द्वारा अनावश्यक बल प्रयोग किया जाता है, तो उस पर निष्पक्ष जांच और कार्रवाई होनी चाहिए। इससे एक संदेश जाएगा कि कानून लागू करने वालों को भी कानून के दायरे में रहना होगा। पारदर्शिता और जवाबदेही से ही विश्वास मजबूत होगा।