जयपुर। करीब एक हजार छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से हटाकर उन्हें जुर्माने या चेतावनी तक सीमित किया गया है। कई में जेल की सजा को खत्म किया गया है, जबकि कई मामलों में सजा को कम या जुर्माने में बदला गया है। दावा किया जा रहा है कि इससे कानून अधिक सरल और व्यावहारिक बनेंगे। सरकार के मुताबिक देश में करीब 5 करोड़ मामले छोटे अपराधों से जुड़े हैं, जो शायद अदालत तक पहुंचने ही नहीं चाहिए थे। अब नए प्रावधानों के बाद इन मामलों को बंद करने की प्रक्रिया तेज की जाएगी। इससे न्याय व्यवस्था पर दबाव कम होगा और गंभीर मामलों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकेगा।
संसद ने इस जन विश्वास (संशोधन) बिल को पास कर दिया है। कहा तो यही जा रहा है कि कानून व्यवस्था सरल होगी और अदालतों का बोझ कम होगा। यह भी सही है कि इस विधेयक को लाने की जरूरत अचानक नहीं पड़ी, बल्कि लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक और कानूनी समस्याओं के कारण महसूस हुई। छोटे-मोटे उल्लंघनों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज होने से न केवल नागरिक परेशान होते थे, बल्कि न्याय व्यवस्था भी अनावश्यक रूप से बोझिल होती जा रही थी। मामूली मामलों में भी गिरफ्तारी या जेल की सजा का प्रावधान था। इससे जेलों पर अनावश्यक दबाव बढ़ता था। जुर्माना आधारित व्यवस्था से इस बोझ को कम करने की जरूरत महसूस की गई। अब इसके पीछे कई वजह बताई जा रही है पर क्या इससे सबकुछ ठीक हो जाएगा।
अदालत में मामले ज्यादा हैं, क्या यह तर्क सही है कि इनकी वजह से लोगों को समय पर न्याय नहीं मिल रहा? यह भी जग जाहिर है कि जेल का भय खत्म होने से क्या छोटे-मोटे अपराध कम या खत्म हो जाएंगे, अब यह लोगों की सुविधा के लिए किया गया है या प्रशासन के काम को आसान करने के लिए, अभी कुछ खास समझ नहीं आ रहा। आम नागरिक को राहत देने की बात कही तो जा रही है पर क्या मिल पाएगी, इस पर संदेह है। पहली नजर में लगता है कि छोटे उल्लंघनों को अपराध से हटाने से अदालतों का बोझ कम होगा। मुकदमों की संख्या घटेगी, न्यायपालिका गंभीर मामलों पर अधिक ध्यान दे सकेगी और फैसले तेजी से आ सकते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि अदालतों में देरी केवल छोटे मामलों की वजह से नहीं होती।
जजों की कमी, लंबी प्रक्रिया, बार-बार तारीखें, जांच में देरी और सरकारी पक्ष की तैयारी कमजोर होना—ये सब बड़े कारण हैं। यदि इन मूल समस्याओं पर काम नहीं हुआ तो सिर्फ जुर्माना व्यवस्था से ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। अब सवाल यह भी उठ रहा है कि जुर्माना व्यवस्था कहीं “पैसे देकर बच निकलने” का रास्ता न बन जाए। आर्थिक रूप से सक्षम लोग बार-बार नियम तोड़ सकते हैं और जुर्माना भरकर आगे बढ़ सकते हैं। इससे कानून का डर कम होने का खतरा रहेगा। कानून-नियम सरल किए जाने के पीछे क्या केवल यही उद्देश्य है कि अदालत के लंबित मामले जल्द हों, कानून तोड़ने वाले छोटे-मोटे मामलों में जेल न हो पाए। अब अदालतों में बढ़ते लंबित मामलों के अन्य कारण भी खोजे जाने चाहिएं। जज नहीं हैं, कई-कई महीनों तक कई कोर्ट इनके बिना रह जाते हैं।
जजों की संख्या पहले से ही कम है और फिर धीमी गति से चल रही सुनवाई के चलते लंबित मामले बढ़ रहे हैं, इस पर भी ध्यान देना चाहिए। गलत करेंगे तो सजा भुगतेंगे, यदि यह डर ही खत्म हो गया तो व्यवस्था कैसे बनेगी। इसमें भी मरण तो उन गरीबों का भी होगा, जो छोटे-मोटे मामलों में जुर्माना नहीं दे पाएंगे। एक और सवाल जवाबदेही का है। यदि नियमों के उल्लंघन पर जेल का डर नहीं रहेगा, तो क्या नियमों की पालना का सिस्टम नहीं गड़बड़ा जाएगा। पर्यावरण, उपभोक्ता अधिकार और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े मामलों में नरमी का असर व्यापक हो सकता है। इसलिए यह जरूरी था कि कई मामलों में सख्ती बनी रहती तो ही अच्छा था। जन विश्वास का उद्देश्य भरोसा बढ़ाना है, लेकिन भरोसा तभी टिकेगा जब कानून का सम्मान भी बना रहे। अब देखना यह भी है कि अदालतों में लंबित बड़े मामलों कितनी जल्दी निस्तारित होते हैं, छोटे- छोटे अपराध में जुर्माना बढ़ने से नागरिकों के साथ सरकार और सिस्टम को क्या फायदा होगा?



