Iran US Israel War: ईरान ही नहीं ट्रंप भी छोड़ें जिद, युद्ध से नहीं निकलेगा स्थायी समाधान

    Iran US Israel War: दुनिया के इतिहास में युद्धों ने कभी स्थायी समाधान नहीं दिया, बल्कि नई समस्याओं को जन्म दिया है। चाहे सीमा विवाद हो, राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई हो या संसाधनों पर कब्ज़े की जंग-हर युद्ध का अंत विनाश, आर्थिक बोझ और मानवीय त्रासदी के रूप में ही सामने आया है। ऐसे में इसे बंद करने की पहल सभी देश करें, ट्रंप भी अपनी जिद छोड़ शांति के लिए आगे आएं।

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    Iran US Israel War: अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों के खिलाफ ‘नो किंग्स’ आंदोलन के तहत अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन हुआ जिसमें लगभग 80 लाख लोग सड़कों पर उतरे। ईरान युद्ध समेत यूं तो कई मुद्दों पर प्रदर्शन था पर विरोध यह बताने के लिए काफी था कि अमेरिका में भी सबकुछ सही नहीं चल रहा। वैसे ट्रंप के कई फैसले पूरी दुनिया में गलत ठहराए गए। वो अनावश्यक टैरिफ लगाने का मामला हो या विदेशी लोगों की नागरिकता पर बने सख्त कानून का। अमेरिका के सभी 50 राज्यों सहित दुनिया के कई प्रमुख शहरों में नो किंग्स विरोध प्रदर्शन हुए। आयोजकों का दावा है कि यह अमेरिकी इतिहास के सबसे बड़े विरोध प्रदर्शनों में से एक है। ट्रंप का विरोध ‘विश्वव्यापी’ होता जा रहा है। ये ट्रंप ही हैं जिन्होंने भारत-पाक के सीज फायर का क्रेडिट बार-बार लिया। कई बार सार्वजनिक रूप से यह भी कहा कि युद्ध नहीं रोकते तो लाखों की जान जाती। ट्रंप अपने व्यवहार को लेकर भी हमेशा निशाने पर रहे हैं हालांकि यह भी सच है कि भारत सरकार का उनसे हमेशा मित्रवत व्यवहार रहा। वो तब भी जब रूस से तेल नहीं लेने का दबाव बार-बार डाला गया, यहां तक कि 50 फीसदी टैरिफ तक लगा दिया गया। वहीं पाकिस्तान को समर्थन देने की कारगुजारी भी उजागर हुई। वहां के सेनाध्यक्ष को अमेरिका बुलाकर सम्मानित किया गया, यह रवैया भी काफी नागवार गुजरा। वो इसलिए भी कि जब दुनिया के तमाम देश पाक की आतंकी हरकतों से वाकिफ हैं तब ऐसा विशेष ‘स्नेह’ क्यों? अब अमेरिकी लोग ही कहने लगे हैं कि ट्रंप एक राष्ट्रपति की तरह नहीं, बल्कि एक ‘अधिनायकवादी राजा’ या किसी ‘तानाशाह’ की तरह व्यवहार कर रहे हैं।

    ट्रंप के ईरान पर किए गए हमलों ने न केवल मध्य पूर्व को अस्थिर कर दिया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी हिला कर रख दिया है। युद्ध के कारण ऊर्जा की कीमतें आसमान छू रही हैं। दुनिया के कई देशों में आम नागरिक तेल और गैस की बढ़ती कीमतों के साथ किल्लत से भी त्रस्त है। सवाल यह नहीं कि युद्ध क्यों हुआ, सवाल तो यह है कि इजरायल की तरफ से अमेरिका को कूदने की आवश्यकता क्या थी? यह भी सच है कि अब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप खुद ईरान से बातचीत की ‘गुहार’ लगा रहे हैं। कहा तो यह भी जाता है कि ट्रंप की विदेश नीति अक्सर “दबाव बनाओ और फिर समझौता करो” है। यही कारण है कि उनका रवैया कई बार आक्रामक लगता है, जबकि बाद में वे खुद को शांति स्थापित करने वाला नेता भी बताते रहे। वेनेजुएला जैसे कई देशों पर हंटर चलाने की कोशिश पर भी ट्रंप घिरे। ईरान युद्ध में नाटो देशों की मदद नहीं मिलने पर भी वे उन पर गरियाते दिखे। उन्हें धमकी भी दी।

    अब पूरी दुनिया में सवाल यह भी उठने लगा है कि ट्रंप की दादागिरी आखिर क्यों सही जा रही है। ईरान युद्ध में भी यह सामने आया कि रूस-चीन समेत कुछ देश अमेरिकी नीति के खिलाफ हैं। इस युद्ध का असर भारत पर भी दिख रहा है, इतिहास बताता है कि ईरान भारत का अच्छा मित्र है, बावजूद इसके उसके साथ बहुत कुछ गलत हो रहा है। भारत न अमेरिका के खिलाफ है न ईरान के, वो यह भी नहीं चाहता कि युद्ध के चलते आमजन बेहाल हो। वो भी चाहता है कि युद्ध खत्म हो, समस्या का समाधान शांति वार्ता से हो। ट्रंप का विरोध अपनी जगह है, अमेरिका एक समृद्ध और मजबूत देश है, ऐसे में उसकी जिम्मेदारी ज्यादा बड़ी है। ईरान के अमेरिका-इजरायल के साथ चल रहे युद्ध का परिणाम कोई अच्छा नहीं रहने वाला। दुनिया के इतिहास में युद्धों ने कभी स्थायी समाधान नहीं दिया, बल्कि नई समस्याओं को जन्म दिया है। चाहे सीमा विवाद हो, राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई हो या संसाधनों पर कब्ज़े की जंग-हर युद्ध का अंत विनाश, आर्थिक बोझ और मानवीय त्रासदी के रूप में ही सामने आया है। ऐसे में इसे बंद करने की पहल सभी देश करें, ट्रंप भी अपनी जिद छोड़ शांति के लिए आगे आएं।