सतर्क हो जाइए वरना मामूली गलती आप पर भी पड़ सकती है भारी

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    संपादक : प्रतीक चौवे

    जयपुर। मामूली सी जानकारी पर किराएदार अथवा नौकर रखना महंगा पड़ रहा है। बढ़ता अपराध इसकी एक बड़ी वजह बनती जा रही है। कुछ दिन पहले एक घर से नौकर-नौकरानी ने करीब पचास लाख का माल चोरी गया। जयपुर के ही मानसरोवर में एक भोजनालय मालिक ने एक जने को बिना जांच-परख के रखा तो वह तीन मोबाइल लेकर ही फरार हो गया। एक ऐसे ही मामले में अनजाना किराएदार हत्या कर भाग छूटा। अब ऐसे मामलों में हर बार आरोपी पुलिस के हाथ लग जाए, यह जरूरी तो नहीं। जब किराएदार-नौकर की कोई जानकारी ही नहीं होगी तो पुलिस उन्हें तलाशेगी कैसे? राज्य की राजधानी जयपुर ही नहीं अन्य जिले-कस्बों के भी यही हाल हैं।

    अपने ही नुकसान से बेखबर लोग, खुद ही अपराधियों को शरण दे रहे हैं। बिना पुलिस वैरिफिकेशन के ही लोग जानबूझकर यह खतरा मोल ले रहे हैं। समस्या केवल जागरूकता की कमी की नहीं, बल्कि लापरवाही की भी है। मकान मालिक अक्सर सोचते हैं कि “कागजी कार्रवाई में समय लगेगा” या “एजेंट ने भेजा है, भरोसेमंद होगा।” लेकिन यही भरोसा कई बार भारी पड़ जाता है। पुलिस बार-बार अपील करती है कि नौकर या किराएदार रखने से पहले पहचान पत्र, स्थायी पते और पुलिस सत्यापन जरूर कराएं, फिर भी इस सलाह को गंभीरता से नहीं लिया जाता। कुछ लोग यह मानकर भी वैरिफिकेशन नहीं कराते कि उनके इलाके में अपराध नहीं होते। लेकिन अपराधी अक्सर ऐसे ही आसान लक्ष्य तलाशते हैं, जहां जांच-पड़ताल न हो। यही वजह है कि कई वारदातों में आरोपी घटना के बाद आसानी से फरार हो जाते हैं, क्योंकि उनके बारे में कोई आधिकारिक रिकॉर्ड ही नहीं होता।

    बरसों से यही कहा जा रहा है कि सचेत रहें। किराएदार रखने से पहले उसका आधार कार्ड समेत अन्य जानकारियां पुख्ता कर लें। बावजूद इसके अच्छे किराए के लालच में इन बातों को ही दरकिनार कर दिया जाता है। वो इसलिए भी कि टेंशन कौन ले, पुलिस से वैरिफिकेशन की माथापच्ची कौन करे। कोई दुकानदार हो या मकान मालिक अक्सर ऐसा ही करते हैं, मसलन नौकर रखने की बात भी यहीं से शुरू होती है। बगल वाले के साफ-सफाई वाली आती है, उससे बात कर ली। रख भी लिया और बाद में पता लगा कि सोने-चांदी के जेवरात लेकर भाग गई। अब उसे महिला की जानकारी हो तब उसके खिलाफ कोई रिपोर्ट दर्ज कराई जाए ताकि ढंग से तहकीकात हो सके। नौकर रखने हों या किराएदार, कानून और प्रशासन दोनों साफ कहते हैं कि पहले सत्यापन जरूरी है। पहचान पत्र लेना, स्थायी पते की पुष्टि करना और पुलिस वैरिफिकेशन कराना—ये सब तय नियम हैं। इसके बावजूद लोग इन नियमों को नजरअंदाज कर देते हैं। नतीजा यह है कि हादसे बढ़ रहे हैं और हर घटना के बाद केवल अफसोस रह जाता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग खतरे को तब तक गंभीर नहीं मानते, जब तक वह उनके दरवाजे तक न पहुंच जाए।

    आसपास किसी वारदात की खबर सुनकर कुछ समय के लिए सतर्कता दिखती है, लेकिन जल्द ही सब भूल जाते हैं। यह लापरवाही अपराधियों के लिए आसान रास्ता बनाती है। बिना वैरिफिकेशन के घर में प्रवेश पाने वाला व्यक्ति पूरी जानकारी हासिल कर लेता है और मौका मिलते ही वारदात को अंजाम दे देता है। नियम इसलिए बनाए गए हैं ताकि सुरक्षा सुनिश्चित हो सके, लेकिन आम लोग इन्हें औपचारिकता समझते हैं। कई मकान मालिक किराएदार से केवल आधार या पहचान पत्र की कॉपी लेकर संतुष्ट हो जाते हैं, जबकि वास्तविक सत्यापन नहीं कराते। नौकर रखने में तो अक्सर इससे भी ज्यादा ढिलाई बरती जाती है—एजेंट या जान-पहचान के भरोसे काम चला लिया जाता है। यही ढिलाई जोखिम बनती है। प्रशासन समय-समय पर चेतावनी देता है, पुलिस अभियान चलाती है, लेकिन जागरूकता के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है। जब तक लोग स्वयं नियमों का पालन नहीं करेंगे, तब तक हादसे रुकना मुश्किल है। सुरक्षा के नियम बोझ नहीं, सुरक्षा कवच हैं—इन्हें अपनाने में देरी नहीं करनी चाहिए। अब सवाल यही है कि क्या हम हर घटना के बाद केवल चर्चा करेंगे या नियमों का पालन भी करेंगे? थोड़ी सतर्कता, थोड़ी जिम्मेदारी और कुछ मिनट का वैरिफिकेशन—इतना प्रयास कई बड़ी घटनाओं को रोक सकता है। वरना लापरवाही की कीमत समाज को बार-बार चुकानी पड़ेगी।