स्वच्छता पर बाद में देना ध्यान, पहले अतिक्रमण तो हटाएं

    गंदगी की सबसे बड़ी जड़ अतिक्रमण और लोगों की लापरवाही है, जब तक इस पर ठीक ढंग से ध्यान नहीं दिया जाएगा तब तक स्वच्छता का कोई भी अभियान हो सफल नहीं हो सकता। वार्ड पार्षद के साथ नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों को भी जवाबदेह होना पड़ेगा। नियम और सख्त हों और जिम्मेदारी बढ़ाई जाए तब ही आमजन के साथ व्यापारी और निगम के कारिंदों की मेहनत रंग ला पाएगी।

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    नगर निगम की ओर से लोगों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाया जा रहा है। निगम के कर्मचारी लाउडस्पीकर के जरिए दुकानदारों के साथ लोगों से अपील कर रहे हैं। दुकानों के बाहर दो डस्टबिन रखने को कहा जा रहा है, ऐसा नहीं करने पर सख्त कार्रवाई के साथ जुर्माना भी वसूला जाएगा। स्वच्छता सर्वेक्षण-2026 के तहत हो रहे जागरूकता कार्यक्रम से सुधार के आसार हैं, यह कहना जल्दबाजी होगी। प्रयास अच्छा है, राजधानी जयपुर स्वच्छ हो, इसके प्रयास व्यापारियों के साथ आमजन को भी करने होंगे। परकोटे के भीतर की बात हो या बाहरी कॉलोनियों की, हर जगह साफ-सफाई अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। इसके लिए जिम्मेदार केवल नगर निगम की कचरा उठाने वाली गाड़ी ही नहीं, बल्कि आप और हम भी हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह भी है कि गंदगी बढ़ती क्यों हैं, लोग लापरवाही क्यों बरतते हैं और अज्ञानता के कारण क्या हैं, इस पर मंथन होना चाहिए। कहने को तो व्यापारी संघ कहते हैं कि वे सब निगम के साथ हैं। बाजारों में कचरा पात्र भी रखवा दिए और व्यापारियों से भी इसके लिए अपील जारी कर दी। बावजूद इसके गंदगी फैलने के कारण भी तो तलाशने चाहिएं।

    असल में परकोटा हो या बाहरी कॉलोनियों के बाजार, अतिक्रमण गंदगी फैलने की एक बड़ी वजह है। दुकानदार बाहर सड़क तक अतिक्रमण कर लेते हैं। रही-सही कसर सड़क पर लगने वाले ठेले और छोटे दुकानदार पूरी कर देते हैं। सुबह दुकान खुलते ही अतिक्रमण करते हैं और रात को माल-सामान दुकान में रखकर चले जाते हैं। इससे होने वाली गंदगी पर तो ध्यान ही नहीं देते। इसके अलावा दुकान पर होने वाले कचरे को बाहर लाकर पटक देते हैं, कई दुकानदार तो इसे कचरा पात्र तक में नहीं डालते। यह भी सही है कि कचरा-गंदगी तो फैलती ही तब है जब हम सब लापरवाह हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि स्वच्छता का यह अभियान पहली बार चला हो, पहले भी कई बार ऐसा ही हुआ। कचरा पात्र रखने की जिम्मेदारी के साथ कचरा उसी में डले, इस पर भी तो ध्यान दिया जाए। जयपुर को स्मार्ट और पर्यटन नगरी के रूप में पहचान मिली है, लेकिन स्वच्छता के मोर्चे पर तस्वीर अभी भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। कई इलाकों में कचरे के ढेर, समय पर नहीं उठता कूड़ा, खुले में फेंका जा रहा निर्माण मलबा और प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग-ये सब मिलकर शहर की छवि पर असर डाल रहे हैं।

    स्वच्छता केवल नगर निगम की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रशासन और नागरिकों की साझा जवाबदेही है अतिक्रमण हटाने के अभियान अक्सर कुछ दिनों की कार्रवाई तक सीमित रह जाते हैं। हटाए गए ठेले और दुकानें दो-तीन दिन में फिर वहीं दिखने लगती हैं। असल में चलती सड़क पर कचरा डालना लोगों की आदत हो गई है। दुकानदार भी गंदगी को सड़क पर डालना अपना अधिकार समझते हैं। सड़क से गुजर रहे राहगीर भी कुछ भी खाएंगे-पिएंगे, कागज-बोतल सब सड़क पर फैंक देते हैं। जयपुर जैसे तेजी से फैलते शहरों में स्वच्छता की चर्चा अक्सर नगर निगम की जिम्मेदारी तक सीमित रह जाती है, जबकि सच्चाई यह है कि गंदगी की जड़ केवल व्यवस्था की कमी नहीं, बल्कि अतिक्रमण और नागरिकों की लापरवाही का संयुक्त परिणाम है। सड़कें सिकुड़ती जा रही हैं, फुटपाथ गायब हो चुके हैं और जहां जगह मिलती है वहीं कचरा डाल दिया जाता है। ऐसे हालात में सफाई का दावा केवल कागजों तक ही सिमट जाता है। सबसे बड़ी जड़ अतिक्रमण और लोगों की लापरवाही है, जब तक इस पर ठीक ढंग से ध्यान नहीं दिया जाएगा तब तक स्वच्छता का कोई भी अभियान हो सफल नहीं हो सकता। वार्ड पार्षद के साथ नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों को भी जवाबदेह होना पड़ेगा। नियम और सख्त हों और जिम्मेदारी बढ़ाई जाए तब ही आमजन के साथ व्यापारी और निगम के कारिंदों की मेहनत रंग ला पाएगी।