जयपुर। शराब सामाजिक बुराई है और इसका धंधा भी ‘गंदा’ है। बावजूद इसके कोई इसे नहीं छोड़ना चाहता। कभी गारंटी राशि कम तो कभी दुकानों का समय बढ़ाने को लेकर विरोध। राजस्थान में शराब की दुकानों की चल रही ऑनलाइन नीलामी बता रही है कि ठेका ‘रिन्यू’ कराने का मौका कोई नहीं छोड़ रहा, कई जिलों में तो 90 फीसदी ठेकेदारों ने दुकानें रिन्यू करा ली है। शराब की अधिकृत दुकान लेने के लिए सरकार और ठेकेदारों के बीच रहने वाली ‘नाराजगी’ लगभग खत्म हो चुकी है। सबसे अधिक राजस्व देने वाली इस सामाजिक बुराई को हर तरह का ‘प्रश्रय’ दिया जाता है। 7665 दुकानों का नवीनीकरण किया जा रहा है। पाली-नागौर समेत कई जिलों में तो पिछले साल वाले 80 फीसदी ठेकेदारों ने ठेके को रिन्यू करा लिया।
सूत्रों का कहना है कि किसी भी ठेकेदार से पूछोगे तो यही कहता मिलता है कि कमाई ही नहीं, आबकारी विभाग ने गारंटी राशि-एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी। माल ज्यादा उठाना पड़ रहा है, उस पर ‘बेगार’ करनी पड़ रही है सो अलग। ऐसा है तो भी यह धंधा नहीं छूट रहा। एक अधिकारी बताते हैं कि शराब के धंधे में कमाई नहीं है तो फिर वो बार-बार क्यों ठेका ले लेते हैं?
बकाया मुश्किल ही वसूल होगा…
बकाया वसूलने को आबकारी विभाग ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी फिर भी डेढ़ हजार करोड़ से अधिक अभी भी लंबित है। नागौर जिले में करीब 35 करोड़ बकाया है तो पाली में चालीस करोड़। लगभग सत्रह सौ करोड़ अब तक वसूल नहीं हो पाए हैं जबकि इसकी कोशिश करीब पांच साल से की जा रही है। पहले तो आबकारी विभाग ने ठेकेदारों की संपत्ति-बैंक खाते तक को रडार पर ले लिया था। उस पर कोढ़ में खाज वाली कहावत चरितार्थ तब और हो गई जब ठेकेदारों की संपत्ति तलाशने निकले तो वो ‘कंगाल’ निकले। किसी ने नौकर तो किसी ने ड्राइवर के नाम ठेके ले रखे थे। अब उनकी सम्पत्ति जीरो निकली और पर्दे के पीछे वाले ठेकेदार पर क्या कार्यवाही हो?
वादे भूल जाते हैं…
लिकर कॉन्ट्रेक्टर यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष पंकज धनखड़ का कहना है,सरकार रिन्यू के समय वादे करती है पर बाद में भूल जाती है। समय नहीं बढ़ा तो हड़ताल करेंगे। उधर नागौर के जिला आबकारी अधिकारी दानाराम ने बताया कि पिछले साल के अधिकांश ठेकेदारों ने दुकान रिन्यू कराई है। सरकार ने की कुछ रियायतें भी दी। यह सही है कि शराब के धंधे में आने के बाद कम ही हैं जो इसे छोड़ते हैं।




