प्रतीक चौवे, संपादक
हमेशा की तरह वैलेंटाइन डे का विरोध इस बार भी किया गया। देशभर में कुछ संगठनों ने इसके विरोध में रैलियां तक निकाली। कई जगह युवक-युवती को पकड़कर पीटने की घटनाएं भी सामने आईं। विरोध करने वालों के अपने-अपने तर्क हैं। इनका कहना है कि वैलेंटाइन डे भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं है। यह पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव है, जो पारंपरिक मूल्यों को कमजोर कर सकता है। इससे भारतीय संस्कृति दूषित होती है। कुछ प्रेम के खुलेआम प्रदर्शन को पूरी तरह गलत बताते हैं। उनका मानना है कि भारतीय समाज की संरचना अधिक पारिवारिक और मर्यादित है, इसलिए सार्वजनिक स्थानों पर ऐसे उत्सव असहजता पैदा करते हैं। कुछ लोग यह भी कहने लगे हैं कि वैलेंटाइन डे अब प्रेम से ज्यादा बाजार का उत्सव बन गया है। यह भी सही है कि महंगे उपहार, रेस्टोरेंट ऑफर जैसे कई अन्य तरीकों से लोगों को लूटा जा रहा है। खैर किसी भी खास दिन-पर्व के लिए यह कोई विशेष बात नहीं है।
बात तो यह भी उचित नहीं है कि वैलेंटाइन डे मनाने वालों के लिए कोई भी पुलिस बन जाए। उन्हें रोके-मारपीट करे। कुछ चैनल्स ने अपने-अपने तरीके इस तरह की खबरें दिखाईं भी। वैलेंटाइन डे के नाम पर पार्कों, कॉलेजों और सार्वजनिक स्थानों पर जोड़ों को परेशान करना या डराना कानून और सामाजिक मर्यादा दोनों के खिलाफ है। इससे समाज में भय और असुरक्षा का वातावरण बनता है, खासकर युवाओं और महिलाओं के लिए। शायद यही कारण रहा कि इस दिन अनावश्यक डर के चलते कई शहरों में सार्वजनिक स्थलों पर युगल कम दिखे। जब देश में पहले से ही ढेरों समस्याएं हैं, तब एक सांस्कृतिक दिवस के विरोध में ऊर्जा लगाना प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है। उन मुद्दों पर अधिक ध्यान देना चाहिए जो आमजन के जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं।
अब यह मांग भी तेजी से उठाई जा रही है कि इस दिन का नाम बदलकर “पुलवामा शहीद दिवस” या इससे जुड़ा कोई दूसरा नाम कर दिया जाए। वो इसलिए भी कि इसी दिन साल 2019 में चालीस जवान आतंकी हमले में शहीद हुए थे। पुलवामा हमला केवल एक आतंकी घटना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शोक और आक्रोश का प्रतीक है। शहीदों के प्रति सम्मान जताने की भावना स्वाभाविक है। हर वर्ष 14 फरवरी को देशभर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम होते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि राष्ट्र अपने बलिदानों को नहीं भूलता। इस प्रस्ताव का विरोध भी कम नहीं है। विरोध करने वालों के अपने ठोस तर्क हैं। कुछ लोगों का कहना है कि शहीदों का सम्मान किसी दिन का नाम बदलने से नहीं, बल्कि ठोस नीतियों और कार्यों से होता है। उनके परिवारों की देखभाल, बेहतर सुरक्षा व्यवस्था और आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी रणनीति। प्रतीकात्मक कदम अक्सर भावनात्मक संतुष्टि तो देते हैं, पर व्यावहारिक बदलाव नहीं लाते। भारत वो देश है जहां शहीदों के सम्मान के लिए कोई खास दिन रखा जाना जरूरी नहीं है। यहां शहीद ही नहीं देश की रक्षा में जुटे हर जवान का सम्मान पूरा देश करता है। उनका हर दिन सम्मान किया जाता है, उन्हें किसी एक खास दिन की आवश्यकता नहीं। शहीदों का सम्मान भी हो और बेवजह किसी को परेशान भी न किया जाए। किसी के वैलेंटाइन डे मनाने का विरोध कर हम क्या बताना चाहते हैं।




