इंफाल:
मणिपुर में इंटरनेट बंद करने का मुद्दा पिछले कुछ वर्षों में कई बार सुर्खियों में रहा है। हालांकि बहुत कम लोगों को याद है कि राज्य में बड़े पैमाने पर इंटरनेट सेवाएं बंद करने की एक महत्वपूर्ण घटना वर्ष 2015 में भी हुई थी। उस समय राज्य सरकार ने बढ़ते विरोध प्रदर्शन और हिंसा की घटनाओं के बीच मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को अस्थायी रूप से बंद करने का फैसला लिया था।
तीन विधेयकों के बाद शुरू हुआ विरोध
31 अगस्त 2015 को मणिपुर विधानसभा में तीन महत्वपूर्ण विधेयक पारित किए गए थे। इन विधेयकों को लेकर खासकर पहाड़ी इलाकों में रहने वाले आदिवासी समुदायों के बीच असंतोष फैल गया। विरोध का केंद्र मुख्य रूप से चुराचांदपुर जिला बना, जहां स्थानीय संगठनों और नागरिक समूहों ने इन विधेयकों के खिलाफ तीव्र प्रदर्शन शुरू कर दिए।
इन प्रदर्शनों के दौरान कई जगहों पर तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई और भीड़ ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। हालात इतने बिगड़ गए कि कई स्थानों पर जनप्रतिनिधियों के घरों को भी निशाना बनाया गया।
चुराचांदपुर में हिंसा और तनाव
चुराचांदपुर जिले में प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा। कई इलाकों में बंद और विरोध प्रदर्शन जारी रहे, जिससे पूरे क्षेत्र में तनाव का माहौल बन गया।
उस समय की रिपोर्टों के अनुसार, हिंसा और पुलिस कार्रवाई के दौरान कई लोगों की मौत भी हुई थी, जिससे राज्य में स्थिति और अधिक संवेदनशील हो गई।
सरकार ने इंटरनेट सेवाएं की बंद
बढ़ते तनाव और अफवाहों के प्रसार को रोकने के उद्देश्य से मणिपुर सरकार ने 1 सितंबर 2015 की शाम से राज्य के कई हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद करने का आदेश जारी किया। इस आदेश के तहत 2G, 3G और 4G मोबाइल डेटा सेवाएं अस्थायी रूप से रोक दी गईं।
सरकार का मानना था कि सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए अफवाहें तेजी से फैल रही थीं, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति और बिगड़ सकती थी।
8 सितंबर को बहाल हुई सेवाएं
लगभग एक सप्ताह तक इंटरनेट सेवाएं बंद रहने के बाद 8 सितंबर 2015 की दोपहर को मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को धीरे-धीरे बहाल किया गया। प्रशासन ने कहा कि स्थिति सामान्य होने के बाद ही सेवाएं शुरू करने का निर्णय लिया गया।
इंटरनेट शटडाउन पर जारी है बहस
मणिपुर में 2015 का यह इंटरनेट शटडाउन देश में इंटरनेट प्रतिबंधों के शुरुआती उदाहरणों में से एक माना जाता है। बाद के वर्षों में भी राज्य में कानून-व्यवस्था के मुद्दों को लेकर कई बार इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरनेट शटडाउन का फैसला प्रशासनिक दृष्टि से तत्काल राहत देने वाला कदम हो सकता है, लेकिन इससे आम नागरिकों, व्यवसायों और सूचना के प्रवाह पर भी बड़ा असर पड़ता है। यही कारण है कि आज भी देश में इंटरनेट बंद करने के फैसलों को लेकर व्यापक बहस जारी है।




