प्रतीक चौवे, संपादक
सबकुछ अस्त-व्यस्त सा हो चला है। अमेरिका-इजरायल के ईरान से चल रहे युद्ध ने अनेक देशों की हालत खराब कर दी है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत ने लगभग सभी देशों का साथ देते हुए ईरान के खाड़ी देशों पर किए जा रहे हमले की निंदा की। अधिकांश देश इस युद्ध के खिलाफ हैं पर बोल कोई नहीं रहा। ईरान के पक्ष में यूं तो चीन-रूस दिख रहा है पर खुलकर सामने नहीं आ रहा। ईरान के नए सुप्रीमो ने पहले संदेश में कह दिया कि होर्मुज मार्ग बंद रहेगा। हालांकि भारत के लिए इसे खोले जाने की बात भी सामने आ रही है। इजरायल ने ईरान के संभावित परमाणु स्थल पर हमला कर दिया है जबकि ईरान का यूएई समेत अन्य देशों पर हमला जारी है। ईरान का कहना है कि अमेरिकी सैन्य ठिकाने जहां हैं, वहां हमले करेगा। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की बैठक में अधिकांश देशों ने भले ही ईरान का पक्ष नहीं लिया हो पर सबने युद्ध बंद करने की पहल की। पीएम मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति से बातचीत कर भारत को शांति-स्थिरता का पक्षधर बताते हुए बातचीत से समाधान पर जोर दिया। तकरीबन तेरह दिनों के युद्ध में तीन हजार लोग मारे गए जबकि घायलों की संख्या काफी ज्यादा है।
हकीकत यह भी है कि न ईरान झुक रहा है न ही अमेरिका युद्ध को खत्म करने के लिए आगे बढ़ता दिख रहा है। इजरायल अमेरिका के इशारे पर पूरी कार्रवाई में जुटा है। हालांकि कहा जा रहा है कि युद्ध खत्म करने के लिए ईरान ने कुछ शर्तें रखी हैं वहीं ट्रंप भी इसको लेकर काफी बयानबाजी कर रहे हैं। रूस-चीन ने ईरान का पक्ष लेते हुए अमेरिका-इजरायल से हमले बंद करने की बात कही है। बहरहाल युद्ध से ईरान-इजरायल ही प्रभावित नहीं है, उसकी आंच भारत समेत अनेक देशों तक पहुंच रही है। गैस सिलेंडरों की मारामारी इसका जीता-जागता सबूत है। अयोध्या में राम रसोई तक बंद कर दी गई, गृह मंत्रालय तक को आदेश देने पड़े कि सिलेंडर वितरण केन्द्रों पर पुलिस तैनात की जाए। कोई भी संघर्ष सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। तेल उत्पादक और सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण देश ईरान से जुड़े युद्ध के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार और कूटनीतिक समीकरणों पर व्यापक असर देखने को मिल रहा है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह स्थिति कई नई चुनौतियां लेकर आई है। खाड़ी क्षेत्र में काम करने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा और रोजगार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। गैस-तेल को लेकर परेशानी है सो अलग।
युद्ध और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब भारत के आम जनजीवन में भी साफ दिखाई देने लगा है। ऊर्जा संकट के रूप में सामने आ रही गैस किल्लत ने एक बार फिर देश की निर्भरता और तैयारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रसोई गैस की किल्लत ने आम परिवारों की दिनचर्या को प्रभावित किया है। कई स्थानों पर सिलेंडर की समय पर बुकिंग नहीं हो पा रही है, तो कहीं डिलीवरी में देरी की शिकायतें बढ़ रही हैं। गैस एजेंसियों के सामने बढ़ती मांग और सीमित आपूर्ति के कारण उपभोक्ताओं को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। यह स्थिति न केवल घरेलू कामकाज को प्रभावित करती है, बल्कि ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी बन जाती है। युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव से परिवहन खर्च बढ़ रहा है। इसका असर आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ जाता है। आम उपभोक्ता को रोजमर्रा के खर्चों में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ता है, जबकि सरकार के सामने आपूर्ति संतुलन और कीमत नियंत्रण की चुनौती खड़ी हो जाती है।
युद्ध कोई भी हो देश-दुनिया पर असर डालता है। यूक्रेन-रूस का युद्ध करीब चार साल से जारी है। वहां भी कोई झुकने को तैयार है, इस युद्ध के कारण सैकड़ों भारतीय बेरोजगार हुए तो बहुतों को बीच में ही डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़कर वापस आना पड़ा। दरअसल, युद्ध केवल मोर्चों पर नहीं लड़ा जाता, इसकी चोट समाज के हर वर्ग पर पड़ती है। इसलिए आज की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि विवादों का समाधान बातचीत, कूटनीति और सहयोग के माध्यम से खोजा जाए। मानवता का भविष्य शांति और सहअस्तित्व में ही सुरक्षित है। नुकसान केवल ईरान को ही होगा, ऐसा नहीं है। इसकी जद में न जाने कितने देश आएंगे, इस बात का ध्यान रखते हुए इंसानियत के लिए अमेरिका को भी आगे आना होगा। वो पहल कर इसे बंद कराए ताकि देश-दुनिया में सुकून लौटे।




