नयी दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक बाजारों में कमजोरी के बीच भारत के तेल-तिलहन बाजार में बीते सप्ताह दबाव का माहौल देखने को मिला। अधिकांश खाद्य तेलों और तिलहनों की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई, हालांकि सोयाबीन दाना अपेक्षाकृत स्थिर बना रहा। बाजार जानकारों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आई नरमी का सीधा असर घरेलू कारोबार पर पड़ा।
इसके अलावा भू-राजनीतिक परिस्थितियों, खासकर पश्चिम एशिया में टकराव, ने भी बाजार की दिशा को प्रभावित किया। सरसों, सोयाबीन तेल, मूंगफली, कच्चा पाम तेल, पामोलीन और बिनौला तेल के दामों में गिरावट देखी गई। हालांकि सरसों की इस साल अच्छी पैदावार हुई है, लेकिन कीमतों में भारी गिरावट नहीं आई। इसका मुख्य कारण यह बताया जा रहा है कि किसान धीरे-धीरे अपनी उपज बाजार में ला रहे हैं, जिससे आपूर्ति नियंत्रित बनी हुई है। किसानों को अपेक्षाकृत बेहतर दाम मिल रहे हैं, जबकि उपभोक्ताओं के लिए सरसों तेल आयातित तेलों की तुलना में सस्ता बना हुआ है।
सूत्रों का कहना है कि आयात में कमी के चलते सरसों से रिफाइंड तेल का उत्पादन भी बढ़ा है, जिससे किसानों को उत्पादन बढ़ाने का प्रोत्साहन मिल सकता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि सरकार को सरसों का भंडारण बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए ताकि भविष्य में कीमतों को संतुलित रखा जा सके। दूसरी ओर, सोयाबीन की आवक सीमित रहने से उसका दाना स्थिर रहा, लेकिन सोयाबीन तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। इसी तरह, ऊंचे दाम और कमजोर मांग के चलते मूंगफली तेल-तिलहन भी दबाव में रहे। विदेशी बाजारों में कमजोरी का असर बिनौला तेल पर भी देखने को मिला।
साप्ताहिक आंकड़ों के अनुसार, सरसों दाना, सरसों तेल और पामोलीन सहित अधिकांश तेलों के भाव नीचे आए। सोयाबीन तेल, मूंगफली तेल और कच्चे पाम तेल में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।
कुल मिलाकर, वैश्विक संकेतों और क्षेत्रीय तनाव के कारण बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में भी कीमतों का रुख अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और घरेलू आपूर्ति पर निर्भर करेगा।



