प्रतीक चौवे, संपादक
होली की धूम के बीच मिलावट का कारोबार जमकर चला। देशी घी के नाम पर मिलावटी मिठाइयां बेची गईं। जांच के नाम पर गिने-चुने सेम्पल लिए गए होंगे भी तो उनकी रिपोर्ट दिवाली तक भी आ जाए, यह जरूरी नहीं। शुद्ध मिठाई का दावा कर जयपुर ही नहीं पूरे प्रदेश और देशभर में भी न जाने कितनी मिलावटी मिठाई खाई गई होगी, स्वास्थ्य कितना का बिगड़ा, इसका आंकड़ा एकदम से जुटाना भी नामुमकिन है। यह जरूर है कि होली के कुछ दिन पहले तक खाद्य सुरक्षा अधिकारी औपचारिकता निभाते नजर आए। गिनी-चुनी कार्रवाई हुईं भी। हर बार यही होता है, त्योहार चाहें होली का हो या दीपावली का। तय दुकानों पर लक्ष्य निर्धारित कर लिया जाता है, बाकी को यह मानकर छोड़ देते हैं कि यहां पर मिलने वाली सामग्री तो मिलावट से पूरी तरह ‘मुक्त’ है।
हकीकत यह है कि कहीं खाद्य सुरक्षा अधिकारी कम हैं, तो कहीं जांच के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई जा रही है, और जनता मजबूर होकर मिलावटी मिठाइयां खाने को विवश है। हाल के दिनों में छापों में कुछ जगह बड़ी मात्रा में नकली खोया, पनीर और घी जब्त हुआ है, जो बताता है कि समस्या कितनी गहरी है। त्योहारों से पहले विशेष अभियान चलाने के बावजूद बार-बार मिलावट पकड़ा जाना इस बात का संकेत है कि निगरानी तंत्र में कहीं न कहीं गंभीर कमी है। कहीं खाद्य सुरक्षा अधिकारी की कमी है तो कहीं जांच के नाम पर खानापूर्ति, ऐसे में मिलावटखोर बेखौफ अपना कारोबार चला रहे हैं।
कई जिलों में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के पद खाली पड़े हैं या ये तय संख्या से कम हैं। जब निगरानी ही सीमित होगी तो मिलावटखोरों के हौसले बढ़ना स्वाभाविक है। छापे अक्सर त्योहारों के आसपास तेज होते हैं, लेकिन साल भर सतत निगरानी का अभाव रहता है। सैंपल लेने से लेकर लैब रिपोर्ट आने और अदालत में मामला पहुंचने तक लंबा समय लग जाता है। कई मामलों में कार्रवाई वर्षों तक लटकी रहती है। नकली मावा, मिलावटी दूध, रंग मिली मिठाइयों या सिंथेटिक मसालों से कम लागत में ज्यादा कमाई होती है। पकड़े जाने की संभावना कम और लाभ ज्यादा, यह गणित इस अवैध धंधे को खूब पनपा रहा है। यह भी सही है कि उपभोक्ता अक्सर सस्ती कीमत या दिखावे के लालच में बिना जांचे-परखे सामान खरीद लेते हैं। बहुत कम लोग शिकायत दर्ज कराते हैं या लेबल पढ़ने की आदत रखते हैं। कुछ जगहों पर जांच के नाम पर दिखावटी कार्रवाई की शिकायतें भी सामने आती हैं। अगर कार्रवाई पारदर्शी और निरंतर न हो तो यह व्यवस्था पर भरोसा कमजोर करती है।
देश में खाद्य मिलावट का कारोबार ऐसा जाल बन चुका है, जो हर त्योहार, हर मौसम और हर शहर में अपने पांव पसार लेता है। कभी दूध में यूरिया, कभी मिठाइयों में सिंथेटिक रंग, सवाल वही है कि आखिर इतने अभियान और कानूनों के बावजूद यह गोरखधंधा खत्म क्यों नहीं हो पा रहा? हकीकत यह भी है कि लगातार निगरानी के बजाय केवल अभियान आधारित कार्रवाई से मिलावटखोरों में डर नहीं बनता। उपभोक्ता जागरूकता की कमी भी कम जिम्मेदार नहीं है। सस्ती मिठाई या दूध के लालच में लोग गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देते। मांग बनी रहेगी तो मिलावट का बाजार भी फलता-फूलता रहेगा। मिलावट सिर्फ खाने की शुद्धता पर हमला नहीं है, यह सीधे जनता के स्वास्थ्य, भरोसे और जीवन पर चोट है।
जब मिठाई, दूध, मसाले या तेल में मिलावट होती है, तो उसका असर धीरे-धीरे पूरे शरीर और समाज पर दिखने लगता है। मिलावट केवल खाद्य अपराध नहीं, बल्कि जन-स्वास्थ्य से खिलवाड़ है। जरूरत है कि जांच तंत्र मजबूत हो, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो और उपभोक्ता भी सतर्क रहें। जब तक प्रशासन सख्त नहीं होगा और समाज जागरूक नहीं बनेगा, तब तक मिठाई में जहर घुलने का यह खेल पूरी तरह खत्म नहीं होगा। केवल त्योहार पर फौरी जांच से कुछ नहीं होने वाला, सख्ती अपनाएं और जिम्मेदारों को भी लापरवाही पर सजा दी जाए तब ही इस पर लगाम लगेगी।




