प्रतीक चौवे, संपादक
राजस्थान यूनिवर्सिटी की उपलब्धियों के ‘शोरगुल’ के बीच परेशानियों पर कोई ध्यान ही नहीं दे रहा। हालत यह है कि यहीं की एक सहायक आचार्य को मानवाधिकार आयोग में शिकायत देनी पड़ती है। मतलब साफ है कि वो तब वहां पहुंची होंगी जब यूनिवर्सिटी प्रशासन ने उनकी बात पर गौर ही नहीं किया होगा। समस्या लेडिज टॉयलेट की है, जिस पर अब मानवाधिकार आयोग ने वाइस चांसलर से रिपोर्ट तलब की है। वाइस चांसलर खुद एक महिला हैं, बावजूद इसके यहां आने वाली स्टूडेंट- टीचर्स की परेशानी से या तो अनजान बनी रहीं या फिर इसे समस्या माना ही नहीं।
यह घटना सिर्फ चिंताजनक नहीं, बल्कि वाकई शर्मनाक है। ए+ कैटेगरी वाले राजस्थान विश्वविद्यालय में एक महिला सहायक प्रोफेसर को लेडीज टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधा के लिए मानवाधिकार आयोग का सहारा लेना पड़े, यह पूरे सिस्टम पर तमाचा है। कार्यस्थल पर सम्मानजनक टॉयलेट की व्यवस्था न होना सीधे-सीधे महिला अधिकारों का उल्लंघन है। और जब यह सब एक महिला वाइस चांसलर के कार्यकाल में हो, तो सवाल और गंभीर हो जाते हैं। यह कोई छोटी समस्या नहीं, जिसे बजट या प्रक्रिया का बहाना बनाकर टाल दिया जाए। शौचालय की कमी सीधे-सीधे महिलाओं के सम्मान, स्वास्थ्य और कार्यस्थल की समानता से जुड़ा सवाल है। अगर यही सुविधा सुनिश्चित नहीं की जा सकी, तो ए+ ग्रेडिंग, बड़े दावे और विकास की बातें खोखली लगती हैं।
सबसे दुखद यह है कि समस्या के समाधान की बजाय चुप्पी साधी गई, जिससे मामला आयोग तक पहुंचा। वाइस चांसलर का पद केवल समारोह की अध्यक्षता, रिपोर्ट पर हस्ताक्षर और ए+ कैटेगरी की उपलब्धियों का श्रेय लेने के लिए नहीं होता। यह पद जवाबदेही, संवेदनशीलता और समय पर हस्तक्षेप करने के लिए होता है। जब सबसे बुनियादी महिला सुविधाओं पर भी ध्यान न दिया जाए, तो नेतृत्व का दावा खोखला हो जाता है। ए+ कैटेगरी का मतलब सिर्फ रैंकिंग नहीं, बल्कि मानव-केंद्रित प्रशासन होता है। जब शिक्षक-वह भी महिला—सम्मान और सुविधा के लिए दर-दर भटके, तो विश्वविद्यालय की साख पर सवाल उठना स्वाभाविक है। नेतृत्व का अर्थ सिर्फ़ पद पर बने रहना नहीं, बल्कि समस्याओं को समय रहते पहचानना और उनका समाधान करना होता है।
यह भी सबको मालूम ही है कि राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्रों ने राज्यपाल को पत्र लिखकर कुलपति के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच की मांग की थी, जिसमें वित्तीय अनियमितता और प्रशासनिक फैसलों पर जांच की बात कही गई थी। इसके बाद विपक्षी नेता टीकाराम जूली ने भी राज्यपाल को पत्र लिखा। इन मामलों पर जांच के निर्देश दिए गए हैं। पद पर बैठ जाना ही सबकुछ नहीं होता। जब समस्याएं अनसुनी रह जाएं—तो इसका सीधा अर्थ है कि नेतृत्व अपना काम ठीक से नहीं कर रहा। महिला गरिमा, कार्यस्थल की सुविधा और मानवीय सम्मान किसी भी विश्वविद्यालय की रीढ़ होते हैं। इन्हें नजरअंदाज करना सीधे-सीधे प्रशासनिक विफलता है। वाइस चांसलर इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, उन्हें अपने में सुधार लाना चाहिए। यूनिवर्सिटी की समस्या को दूर करना उनकी जिम्मेदारी है।




