संपादक, प्रतीक चौवे
बैंक खाते फ्रीज होने की घटनाएं तेजी से बढ़ रही है। संदिग्ध लेनदेन/साइबर क्राइम के चलते जांच के लिए इसे आवश्यक कदम बताया जाता है। जांच कितने दिन चले और खाता कब दोबारा चालू होगा, इसकी कोई मियाद तय नहीं है। डिजिटल के जमाने में अब खाता फ्रीज होने का सीधा सा मतलब है कि सबकुछ अस्त-व्यस्त। सभी जानते हैं कि अब दूध से लेकर सब्जी तक का भुगतान ऑनलाइन होने लगा है। ये बैंक खाते यूं तो अस्थाई फ्रीज किए जाते हैं पर बिना बात के संबंधित व्यक्ति की पीड़ा कोई नहीं समझता। ऑनलाइन ठगी, फर्जी कॉल और संदिग्ध ट्रांजेक्शन की शिकायतों के बीच अब एक नई समस्या आम नागरिकों के सामने खड़ी हो गई है, बैंक खातों का अचानक फ्रीज हो जाना। खाते फ्रीज होने से आम नागरिक की पूरी आर्थिक व्यवस्था प्रभावित हो जाती है। अदालतों ने भी माना है कि पूरे खाते को रोक देने से लोगों को अनावश्यक कठिनाई होती है और इसी कारण निर्देश दिए गए हैं कि केवल विवादित राशि ही रोकी जाए। हर वर्ष हजारों खाते संदिग्ध लेन-देन के चलते रोक दिए जाते हैं। बड़े साइबर या घोटाले के मामलों में तो एक साथ कई हजार खातों पर कार्रवाई भी की जाती है। डिजिटल लेन-देन के इस दौर में बैंक खाता केवल बचत का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह आम नागरिक की पूरी आर्थिक गतिविधि का केंद्र बन चुका है। ऐसे में अचानक खाता फ्रीज होने से परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें प्रभावित हो जाती हैं। इलाज, बच्चों की पढ़ाई, व्यापारिक भुगतान और घरेलू खर्च जैसे जरूरी काम भी ठप पड़ जाते हैं। कई बार खाताधारकों को यह तक स्पष्ट नहीं बताया जाता कि आखिर उनका खाता किस कारण रोका गया है।
साइबर अपराध पर नियंत्रण के लिए यह कार्रवाई जरूरी मानी जाती है, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब निर्दोष नागरिक भी इसकी चपेट में आ जाते हैं। बैंक और जांच एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी, सूचना का अभाव और प्रक्रिया की धीमी गति लोगों की परेशानी को और बढ़ा देती है। विडंबना यह है कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था ही अब डिजिटल लेन-देन से लोगों को डराने लगी है। कई मामलों में खाताधारक को यह तक नहीं बताया जाता कि उसका “कसूर” क्या है। बैंक शाखाओं और साइबर थानों के चक्कर लगाते-लगाते लोग थक जाते हैं, लेकिन राहत समय पर नहीं मिलती। निस्संदेह साइबर ठगी और वित्तीय अपराध गंभीर खतरा हैं और इनके खिलाफ सख्त कदम जरूरी भी हैं। लेकिन क्या सख्ती का मतलब यह है कि निर्दोष नागरिकों को भी समान रूप से दंडित किया जाए? यदि जांच के नाम पर पूरे खाते को ही रोक दिया जाएगा तो डिजिटल व्यवस्था पर भरोसा कैसे बचेगा? जरूरत इस बात की है कि केवल संदिग्ध राशि पर रोक लगे, खाताधारकों को तुरंत सूचना दी जाए और जांच की प्रक्रिया पारदर्शी व समयबद्ध हो। बावजूद इसके ऐसा होता नहीं है।
हाल ही में जोधपुर हाईकोर्ट ने भी अपने निर्णय में यही कहा है कि पूरे खाते को फ्रीज न किया जाए, केवल संदिग्ध राशि पर रोक लगे। ऐसे आदेश पहले भी हो चुके हैं, जनता भी परेशान इसलिए भी है कि इन आदेशों की पालना नहीं हो रही। फ्रीज खाते के लिए जाओ तो बैंक कहती है कि पुलिस से बात करो, पुलिस के पास जाओ तो वो बैंक भेजते हैं। अब भला आम आदमी जाए तो जाए कहां? यह भी सही है कि न पुलिस सहयोग करती है न बैंक। अब अदालतों के बार-बार आदेश के बाद भी पूरा खाता क्यों फ्रीज किया जाता है? इस तरह की प्रक्रिया से सही आदमी भी दोषी ठहरा दिया जाता है, अब संदिग्ध लेन-देन ठगी-धोखाधड़ी का आरोपी वो कैसे। यह पैसा कई ट्रांजेक्शन के जरिए किसी दूसरे के पेमेंट के थ्रू उसके पास पहुंचा भी तो वो कैसे कसूरवार हुआ। असल में जांच का सिस्टम ही सही नहीं है, आरोपी को पकड़ने के पहले ठीक ढंग से जांच हो यह तो जरूरी है पर खाते फ्रीज कर देने से ही आरोपी तुरंत पकड़ में आ जाएं, ऐसा दिखता नहीं है। पुलिस का रिकॉर्ड खंगालकर देखा जाए तो साइबर क्राइम के हजारों मामले अभी भी लंबित चल रहे हैं। पिछले दिनों अदालत ने ही बताया था कि बढ़ती धोखाधड़ी रोकने के लिए सरकार को अपना प्लान बताना होगा। बहरहाल साइबर क्राइम को रोकने के लिए कुछ भी हो पर किसी का पूरा खाता तो फ्रीज न किया जाए। वो भी तब जब अदालतें इस बाबत कई बार आदेश जारी कर चुकी हैं। या यह माना जाए कि पुलिस-बैंक अदालत से ऊपर हैं।




