रिपोर्टर : मनीष कुमार शर्मा
National Institute of Ayurveda Research : जयपुर। तंबाकू जानलेवा है…बीड़ी या सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है… तंबाकू जनित उत्पादों के हर पैकेट पर यह चेतावनी लिखी देखी जा सकती है, लेकिन फिर भी तंबाकू की लत छूटने का नाम ही नहीं लेती। कई बार यह तलब कैंसर जैसी भयावह बीमारियों का कारण बन जाती है। अब खास खबर यह है कि जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान ने सालों की रिसर्च के बाद बीड़ी-सिगरेट पीने की इस तलब को कम करने का फार्मूला ढूंढ लिया है। जिसे पेटेंट कराने की तैयारी है, जिसके बाद उम्मीद है कि जल्द ही यह बाजार में भी मिलने लगेगा।
दरअसल, देशभर में लाखों लोग धूम्रपान करते आसानी से देखे जा सकते हैं। कई बार लोग तनाव, आदत या दिखावे के कारण सिगरेट पीना शुरू करते हैं और धीरे-धीरे इसकी लत लग जाती है। निकोटीन की यह लत इतनी गहरी होती है कि बहुत से लोग चाहकर भी उसे छोड़ नहीं पाते। अब ऐसे लोगों को धूम्रपान छोड़ने में मदद करने के लिए राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान(NIA) के अगद तंत्र विभाग ने आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों को सिगरेट का जैसा रूप दिया है, जिसका नाम ‘देवदार्व्यादि धूम्र’ रखा गया है। विभाग की प्रमुख प्रोफेसर डॉ. अनिता शर्मा के निर्देशन में डाॅ. शुभांगी शर्मा और उनकी टीम ने करीब 2 साल की रिसर्च के बाद धूम्रपान छोड़ने की इच्छा रखने वाले लोगों पर इसका ट्रायल किया है। इसका परिणाम यह रहा कि अब तक लगभग 60 मरीजों को तंबाकू निकोटीन (सिगरेट) की लत छोड़ने में लाभ मिला है। खास बात यह है कि ‘देवदार्व्यादि धूम्र’ में केवल आयुर्वेदिक औषधियों का समावेश है, जिनका नाम यहां साझा नहीं किया जा रहा। इसका कारण यह है कि अब संस्थान इस फार्मूले का पेटेंट कराने की योजना बना रहा है, जिसके बाद इसके बाजार में उपलब्ध होने की उम्मीद जताई जा रही है।

निकोटिन दिमाग पर इस तरह डालता है असर
संस्थान के विशेषज्ञों के अनुसार जब कोई व्यक्ति सिगरेट, बीड़ी या अन्य तंबाकू उत्पाद लेता है, तो निकोटीन तेजी से मस्तिष्क तक पहुंचकर डोपामिन नामक न्यूरोट्रांसमीटर को बढ़ाता है। डोपामिन बढ़ने से व्यक्ति को कुछ समय के लिए अच्छा महसूस होता है। मस्तिष्क इस एहसास को “रिवॉर्ड” की तरह पहचान लेता है और उसी अनुभव को दोहराने के लिए व्यक्ति बार-बार तंबाकू लेने लगता है।
निकोटिन नहीं मिलने पर व्यक्ति को महसूस होता है चिड़चिड़ापन
लगातार निकोटीन लेने से मस्तिष्क को इसकी आदत सी होने लगती है। जब निकोटीन नहीं मिलता है तो विथड्रॉवल लक्षण दिखाई देते हैं-जैसे बेचैनी, चिड़चिड़ापन, सिर भारी लगना, ध्यान न लगना और तंबाकू की तीव्र इच्छा। ऐसे में मस्तिष्क को वही सुखद अनुभव पाने के लिए ज्यादा निकोटीन चाहिए, जिससे लत और तलब कहा जाता है।
इस तरह काम करता है ‘देवदार्व्यादि धूम्र’
‘देवदार्व्यादि धूम्र’ में प्रयुक्त औषधियां आयुर्वेद में मेध्य (मस्तिष्क को पोषण देने वाली) है। शोध के अनुसार, इस धूम्र का प्रयोग करने पर मस्तिष्क में डोपामिन का संतुलित स्राव होने में सहायता मिलती है। इसका प्रभाव कुछ हद तक निकोटीन के समान महसूस हो सकता है, लेकिन बिना तंबाकू के दुष्प्रभावों के। इसी कारण कई मरीजों में निकोटीन के विथड्रॉवल लक्षण कम हो जाते हैं या दिखाई नहीं देते। इस प्रक्रिया से मस्तिष्क को वह “रिवॉर्ड” जैसा संकेत मिलने लगता है, जिसकी उसे आदत हो चुकी होती है। इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति में तंबाकू की तीव्र इच्छा घटने लगती है। साथ ही, यह विधि धीरे-धीरे मस्तिष्क को निकोटीन पर निर्भरता से बाहर लाने में मदद कर सकती है। हालांकि, व्यक्ति में धूम्रपान छोड़ने की इच्छा शक्ति पहली प्राथमिकता है।

संस्थान पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से आयुर्वेद उपचार, अध्ययन व अनुसंधान के लिए कार्य कर रहा है। देवदार्व्यादि धूम्र को लेकर ट्रायल चल रहा है, परिणाम सकारात्मक हैं। इनके आधार पर ही पेटेंट करवाने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए नवाचारों व विभिन्न रिसर्च के साथ संस्थान आगे बढ़ रहा है। प्रो. संजीव शर्मा, निदेशक, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान

‘देवदार्व्यादि धूम्र’ एक सहायक उपाय के रूप में निकोटीन लत से जूझ रहे लोगों के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है। यह नशा छोड़ने की प्रक्रिया को आसान बनाकर, विथड्रॉवल के लक्षणों को कम करने में सहायक हो सकता है। हालांकि, इसे चिकित्सकीय मार्गदर्शन और जीवनशैली सुधार के साथ अपनाना अधिक लाभकारी रहता है। प्रो. अनिता शर्मा, विभागाध्यक्ष, अगद तंत्र विभाग, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान – जयपुर




