संपादक, प्रतीक चौवे
केंद्र सरकार ने घरेलू हवाई किराए पर लगाई गई अस्थाई सीमा को हटा दिया है। अब एयरलाइंस बढ़ती परिचालन लागत के बीच अपनी मांग और बाजार की स्थिति के अनुसार स्वतंत्र रूप से टिकटों की कीमतें तय कर सकेंगी। इंडिगो की बड़े पैमाने पर उड़ानों में व्यवधान के कारण टिकटों की कीमतों में असामान्य वृद्धि को रोकने के लिए 6 दिसंबर को घरेलू हवाई किराए पर अस्थाई सीमा लगाई गई थी। सरकार ने यह फैसला ऐसे समय में लिया है जब पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण एयरलाइंस अंतरराष्ट्रीय मार्गों पर उड़ानों में गंभीर बाधाओं का सामना कर रही हैं। इस तुरत-फुरत निर्णय के कारण क्या हैं, किसी को नहीं पता। सीधा सा मतलब है कि हवाई किराए पर कोई भी वसूली का अधिकार एयरलाइंस को वापस मिल गया है, ठीक उन्हीं प्राइवेट स्कूल-कॉलेज की तरह जो अनाप-शनाप फीस वसूल करते हैं। उन्हें कोई रोक-टोक नहीं है, लंबे समय से यह मुद्दा राज्य ही नहीं केन्द्र सरकार तक को पता है। लंबे आंदोलन भी चले और कमेटियां गठित भी हुई। रिपोर्ट दी गई पर सरकार ने कुछ भी ऐसा नहीं किया जो स्कूली बच्चों के अभिभावकों के लिए फायदेमंद रहा हो। फीस हर साल तेजी से बिना रोकटोक के बढ़ रही है। ऐसा ही अब एयरलाइंस को भी छूट देकर किया जा रहा है। यह कदम जहां एक ओर एयरलाइंस कंपनियों के लिए राहत लेकर आया है, वहीं आम यात्रियों के लिए चिंता का कारण भी बन गया है। एयरलाइंस कंपनियों के लिए जरूर यह राहत भरा कदम है। वे मांग और आपूर्ति के हिसाब से किराया तय कर सकती हैं, घाटे की भरपाई कर सकती हैं और अपने कारोबार को स्थिर कर सकती हैं। इसमें भी नुकसान तो आखिर आम यात्रियों को ही उठाना पड़ेगा।
दिसंबर में इंडिगो एयरलाइंस का हाल सबने देखा। हजारों यात्री परेशान रहे, मनचाहा किराया वसूला गया। ठीक वैसे ही जैसे कोरोना काल में हुआ था। अब जब यह सीमा हटा दी गई है तो एयरलाइंस एक तरफा इकोनॉमी टिकट के लिए पिछली ऊपरी सीमा से अब बंधी नहीं रहेंगी और वे मांग तथा बाजार की स्थिति के अनुसार टिकटों की कीमतें तय कर सकेंगी। दावा किया जा रहा है कि यह फैसला विमानन टरबाइन ईंधन (एटीएफ) की बढ़ती कीमतों और उड़ान संचालन को प्रभावित करने वाले भू-राजनीतिक तनावों के बाद आया है, जिससे एयरलाइन के खर्चों में काफी वृद्धि हुई है। हालांकि सरकार कह रही है कि एयरलाइंस पर बराबर नजर रहेगी, वे मनमाना किराया न वसूलें। सरकार ने साफ कहा है कि एयरलाइन्स को जिम्मेदारी से काम करना होगा और किराया वाजिब और पारदर्शी रखना होगा। त्योहारों, ज्यादा डिमांड या किसी इमरजेंसी के समय किराये में बेतहाशा बढ़ोतरी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अगर एयरलाइन्स ने अनुचित तरीके से दाम बढ़ाए, तो सरकार इसे गंभीरता से लेगी।
यहां बताते चलें कि सरकारी दावे पूरी तरह सच नहीं होते। ठीक प्राइवेट स्कूल-अस्पतालों की तरह। सरकार कोई भी हो, हर बार यही सुनने को मिलता है कि मनमानी फीस नहीं लेने देंगे, स्कूल हो या अस्पताल- बराबर कार्रवाई करेंगे। ज्यादा करेंगे तो इनकी मान्यता समाप्त की जाएगी। पिछले पांच सालों का ही रिकॉर्ड उठाकर देखे लें, कितने स्कूल या अस्पतालों की मान्यता रद्द हुई या कितनों ने मनमानी फीस वसूलना बंद कर दिया। आम जनता को राहत मिले, काम ऐसा होना चाहिए। बावजूद इसके जनता का ध्यान ही नहीं रखा जाता। अब हवाई टिकटों के दाम बाजार के हिसाब से तय होंगे, तो सरकार यात्रियों के हितों की रक्षा के लिए निगरानी कैसे करेगी। कहा तो यह भी जा रहा है कि अगर कंपनियों को अपने हिसाब से किराया तय करने की छूट मिलेगी, तो वे घाटे से उबर सकेंगी और सेवा की गुणवत्ता भी सुधार सकेंगी। सरकार धीरे-धीरे कई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष नियंत्रण कम कर रही है और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे रही है। तर्क यह है कि जब बाजार में कई खिलाड़ी होंगे, तो वे खुद ही कीमतों को संतुलित कर देंगे। ऐसा ही है तो फिर प्राइवेट स्कूल-अस्पतालों की मनमानी तो नहीं रुकी, प्रतिस्पर्धा के चलते इन्होंने तो अपना शुल्क कम नहीं किया। फिजूल की बातों से आम आदमी को राहत नहीं मिलने वाली, ठोस निर्णय लिए जाएंगे तभी ये लूट-छूट रुक पाएगी।



