प्रतीक चौवे, संपादक
हर साल का बजट सुकून दे जाता है। आंकड़ों की उलझन के बीच मिलने वाली छोटी-छोटी राहत भी मन को भाती हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही है। हर वर्ग की अपनी उम्मीदें, उनके पूरी होने न होने के बीच अनिगनत कारण और सरकार की अपनी मजबूरी। घोषणाएं करना और उनके पूरी होने के बीच लंबा फासला होता है। कुछ योजनाएं-कार्य तो शुरू ही नहीं हो पाते और कुछ अटक कर रह जाते हैं। कारण भले ही कुछ भी हो पर जनता को तो फायदे नहीं मिल पाते। कोई काम तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से रुक जाते हैं तो कई धीमी रफ्तार पर ‘रेंगते’ रहते हैं। कहीं प्रगति कम तो कहीं लक्ष्य अधूरा। प्रदेश की जनता तो चाहेगी ही कि राज्य सरकार की ओर से की जाने वाली घोषणाएं जल्द से जल्द पूरी हो। आमजन को इससे कोई मतलब नहीं कि तकनीकी कारण क्या हैं या फिर सरकार का काम धीमा क्यों है, वो इसलिए भी कि वो भरोसा करती है कि जो कहा गया है, वो होने वाला है। यह भी सच है कि साल पूरा होने के बाद भी शत-प्रतिशत घोषणाएं पूरी नहीं हो पातीं। कभी सत्तर फीसदी तो कभी पचास फीसदी बताते हुए अन्य योजनाओं के काम को प्रगति पर बता दिया जाता है। यह तो सबको मालूम ही है कि काम में समय लगता है पर उसे करने वाले विभाग-ठेकेदार कितनी ‘ईमानदारी’ बरतते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।
हर साल बारिश आते ही अनगिनत सड़कें बह जाती हैं तो कभी पेयजल लाइन तो कभी सीवरेज लाइन टूट जाती है। राज्य सरकार के बजट हर साल बड़ी-बड़ी घोषणाओं के साथ आते हैं। रोजगार, सड़कें, जल योजनाएं, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि सहयोग जैसी उम्मीदें जगाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार ने साल 2022–23 के बजट में किए गए करीब 2,722 घोषणाओं में लगभग 86–87 फीसदी को पूरा करने का दावा किया था, जबकि बाकी प्रक्रियाधीन रहे। बताया जाता है कि जैसलमेर-जयपुर जैसे बड़े मार्गों और ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे पर काम धीमा रहा, बजट में घोषित नौकरियों का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ, और भर्ती प्रक्रियाएं लंबित हैं। गांवों में जल-नल कनेक्शन देने का लक्ष्य अब तक पूरा नहीं हो पाया है। स्कूलों की मरम्मत, कक्षा निर्माण, लैब और टॉयलेट सुविधाओं पर क्या हो रहा है, यह भी किसी से छिपा नहीं है।
बजट में घोषित राशि और वास्तविक खर्च में अक्सर अंतर रह जाता है। कई योजनाएं शुरू तो होती हैं, पर अधूरी रह जाती हैं। कुछ परियोजनाएं प्रशासनिक देरी का शिकार होती हैं, तो कुछ संसाधनों की कमी से अटक जाती हैं। इसके चलते आम आदमी तक लाभ पहुंचने में देर होती है या वह आधा-अधूरा ही रह जाता है। सरकार अपने स्तर पर बेहतर से बेहतर करने का प्रयास करती है, बावजूद इसके कई कारणों से यह हो नहीं पाता। कई बार विभागों के बीच तालमेल की कमी से काम रुकता है। स्पष्ट कार्यविभाजन, नियमित समीक्षा बैठकें और प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। बजट केवल घोषणा-पत्र नहीं, शासन की विश्वसनीयता की कसौटी है। जनता को वादों की सूची नहीं, परिणाम चाहिए। राज्य सरकार यदि प्राथमिकताओं को स्पष्ट रखे, पारदर्शिता बढ़ाए और जवाबदेही तय करे, तो बजट घोषणाएं समय पर पूरी होना असंभव नहीं है। यही सरकार और जनता के बीच भरोसे की डोर को मजबूत करता है।



