प्रतीक चौवे, संपादक
अदालत ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए हैं। दरअसल, शाकुंभरी पीठाधीश्वर आशुतोष ब्रह्मचारी ने अर्जी दाखिल की थी। इसमें एफआईआर दर्ज कर सख्त कार्रवाई किए जाने की मांग की थी। आरोप लगाने वाले दोनों नाबालिगों का अदालत में वीडियोग्राफी के साथ बयान भी दर्ज किया गया था। मामला यौन शोषण का बताया जा रहा है। अब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि आरोप लगाने वाला खुद हिस्ट्रीशीटर है। उसकी हिस्ट्रीशीट खुली है। थाने की दीवार पर टंगे बोर्ड पर उसका नाम है। उसका काम ही लोगों पर फर्जी मुकदमा करा धन उगाही करना है। यह रामभद्राचार्य का शिष्य बन जाता है, अजीब बात है।
असल में अविमुक्तेश्वरानंद और योगी सरकार के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। पिछले माह प्रयागराज में उनके स्नान पर प्रशासन ने अघोषित पाबंदी सी लगा दी थी, विवाद बढ़ने पर पहले वे कई दिन तक अघोषित धरने पर बैठे रहे और बाद में बिना स्नान के बनारस लौट गए। योगी समेत उनकी सरकार ने अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने पर ही सवाल खड़े कर दिए। यहां तक की योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में कहा कि कोई भी व्यक्ति खुद को शंकराचार्य नहीं लिख सकता। शंकराचार्य जैसी परंपरागत धार्मिक उपाधि कोई भी व्यक्ति स्वयं घोषित करके नहीं लगा सकता; इसके लिए परंपरा, मान्यता और धार्मिक संस्थागत प्रक्रिया होती है। इसे भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जोड़कर देखा गया।
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती मार्च में लखनऊ में गौ-हत्या के विरोध में धरना देने का ऐलान पहले ही कर चुके थे। उनका कहना है कि गौ-संरक्षण सनातन परंपरा और संवैधानिक भावना दोनों से जुड़ा विषय है, इसलिए इस मुद्दे पर जनजागरण और शांतिपूर्ण विरोध जरूरी है। समर्थकों के अनुसार यह धार्मिक-सांस्कृतिक आस्था का मामला है और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करना उनका अधिकार है।
हालांकि कुछ का कहना यह भी है कि यह मौजूदा विवादों के बीच माहौल को और गर्म करने वाला कदम है। संवेदनशील मुद्दों पर बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम कानून-व्यवस्था की चुनौती भी बन सकते हैं। इस बीच एफआईआर दर्ज करने के आदेश के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का यह बयान भी चर्चा में है कि मामले की जांच जल्द पूरी की जाए। जांच में जो फर्जी है वो तो फर्जी ही सिद्ध होगा। सनातन के ऊपर आरोप किसी विधर्मी ने नहीं लगाया है। जांच के बाद सब साफ हो जाएगा। सच्चाई सामने आ जाएगी।
मामले में देशभर की निगाह है इसलिए जांच और अदालत की प्रक्रिया जल्द निपटाई जानी चाहिए। अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा मौजूदा विवाद जिस तरह आस्था, कानून और राजनीति के बीच उलझ गया है, उससे साफ है कि इसका समाधान केवल बयानबाजी से नहीं निकलेगा। सबसे पहला और निर्णायक कदम निष्पक्ष तथा समयबद्ध जांच है। एफआईआर दर्ज होते ही जांच एजेंसियों को बिना दबाव और बिना पूर्वाग्रह के तथ्यों की पड़ताल करनी होगी। यदि आरोपों में दम है तो कानून अपना काम करे, और यदि नहीं है तो स्पष्ट रूप से क्लीन चिट देकर अनावश्यक विवाद समाप्त किया जाए। आधे-अधूरे निष्कर्ष अक्सर विवाद को और बढ़ाते हैं। जनता का भरोसा बढ़े, इसके लिए संत समाज हो या सरकार, इन्हें अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।




