Hezbollah Iran Support : नई दिल्ली। (आलोक शर्मा) मध्य पूर्व की राजनीति में कुछ रिश्ते सिर्फ कूटनीति के कागजों पर नहीं बनते, बल्कि इतिहास, पहचान और साझा संघर्ष से आकार लेते हैं। ईरान और लेबनान के बीच संबंध भी इसी तरह के हैं। यही कारण है कि जब लेबनान पर दबाव बढ़ता है, तो ईरान न केवल खुलकर समर्थन देता है बल्कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका जैसी महाशक्ति से टकराने के संकेत भी देता है। यह सवाल अब और भी महत्वपूर्ण हो गया है कि आखिर ऐसा क्या है जो इन दोनों देशों को इतना करीब लाता है। इसको समझना बेहद जरूरी है, खासकर उस वक्त जब मीडिल ईस्ट में युद्ध जारी हो।
विचारधारा की डोर: “प्रतिरोध” की राजनीति
ईरान खुद को पश्चिमी प्रभाव और इजरायल के खिलाफ “प्रतिरोध की धुरी” का केंद्र मानता है। इस धुरी में लेबनान का सबसे प्रभावशाली संगठन हिज्बुल्लाह प्रमुख भूमिका निभाता है। 1980 के दशक में ईरान के समर्थन से बने हिज्बुल्लाह ने धीरे-धीरे लेबनान की राजनीति और सुरक्षा ढांचे में अपनी मजबूत पकड़ बना ली। ईरान के लिए यह संगठन केवल एक सहयोगी नहीं, बल्कि उसकी क्षेत्रीय रणनीति का विस्तार है। ऐसे में हिज्बुल्लाह पर कोई भी हमला, ईरान के प्रभाव पर सीधा प्रहार माना जाता है।
रणनीतिक मजबूरी: इजरायल के खिलाफ फ्रंटलाइन
मध्य पूर्व में इजरायल और ईरान के बीच तनाव किसी से छिपा नहीं है। लेबनान, खासकर उसका दक्षिणी हिस्सा, इजरायल की सीमा से सटा हुआ है। यही वजह है कि ईरान, हिज्बुल्लाह के जरिए इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए रखता है। यह उपस्थिति इजरायल के खिलाफ एक “डिटरेंस” यानी रोकथाम की ताकत का काम करती है। अगर लेबनान में यह पकड़ कमजोर होती है, तो ईरान की रणनीतिक स्थिति भी कमजोर पड़ सकती है।
धार्मिक जुड़ाव: पहचान से जुड़ा रिश्ता
ईरान एक शिया बहुल देश है और लेबनान में भी शिया समुदाय की बड़ी आबादी है। हिज्बुल्लाह इसी समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है। ईरान खुद को वैश्विक स्तर पर शिया मुसलमानों का संरक्षक मानता है। इसलिए लेबनान में किसी भी तरह का संकट, ईरान के लिए सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि धार्मिक और भावनात्मक जुड़ाव का विषय भी बन जाता है।
अमेरिका से टकराव: प्रभाव बचाने की लड़ाई
अमेरिका और ईरान के बीच दशकों पुराना तनाव है। अमेरिका, हिज्बुल्लाह को आतंकी संगठन मानता है और लेबनान में उसके प्रभाव को कम करना चाहता है।
ईरान इसे अपनी क्षेत्रीय शक्ति के लिए सीधी चुनौती के रूप में देखता है। अगर वह इस मोर्चे पर पीछे हटता है, तो पूरे मध्य पूर्व में उसका प्रभाव कम हो सकता है। यही वजह है कि लेबनान के मुद्दे पर ईरान का रुख अक्सर आक्रामक नजर आता है।
शक्ति संतुलन का केंद्र: लेबनान
मध्य पूर्व में यह टकराव सिर्फ देशों का नहीं, बल्कि दो धड़ों का है। एक तरफ अमेरिका, इजरायल और उनके सहयोगी हैं तो दूसरी तरफ ईरान, हिज्बुल्लाह और उनके समर्थक। इस समीकरण में लेबनान एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यहां की स्थिति सीधे पूरे क्षेत्र के शक्ति संतुलन को प्रभावित करती है। अगर यहां अस्थिरता बढ़ती है, तो इसका असर पूरे मध्य पूर्व में देखने को मिल सकता है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो ईरान और लेबनान का रिश्ता केवल कूटनीतिक संबंध नहीं है। यह विचारधारा, रणनीति और धार्मिक पहचान का एक जटिल मिश्रण है। हिज्बुल्लाह के माध्यम से ईरान ने लेबनान में अपनी जड़ें इतनी गहरी कर ली हैं कि अब वहां का हर घटनाक्रम सीधे तेहरान की रणनीति से जुड़ जाता है। यही कारण है कि लेबनान के मुद्दे पर ईरान किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखाई देता है। क्योंकि यह सिर्फ एक देश का सवाल नहीं, बल्कि उसके पूरे क्षेत्रीय प्रभाव और पहचान की लड़ाई है।



