प्रतीक चौवे, संपादक
बच्चे स्कूल पढ़ने ही जाते हैं, अब वहां भी उनसे बेगार कराई जाए तो इसे सब ‘बेकार’ ही तो कहेंगे। सच तो यही है प्रदेश के सरकारी स्कूलों में अधिकांश का यही हाल है। कहीं बच्चे साफ-सफाई में जुटे दिखते हैं तो कहीं शिक्षकों की सब्जी लाने में। कहीं-कहीं तो बच्चों को पुताई-कलर के काम तक में लगा दिया जाता है, अब यह ‘बालश्रम’ शोषण नहीं तो और क्या है? मानसरोवर-सांगानेर में ऐसे नजारे आए दिन दिख रहे हैं। पूछो तो शिक्षक अलग-अलग तर्क देते दिख रहे हैं।
कई सरकारी स्कूलों में चपरासी, सफाईकर्मी या सहायक स्टाफ नहीं हैं तो वहां इनका काम भी बच्चे ही कर रहे हैं। कुछ स्थानों पर यह सोच अब भी मौजूद है कि थोड़ा बहुत काम बच्चों के लिए बुरा नहीं है। लेकिन यह तर्क संवैधानिक अधिकारों के सामने टिक नहीं सकता। यह तो सबको मालूम ही है कि जब बच्चे पढ़ाई की जगह श्रम में लगते हैं, तो उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। इससे सरकारी स्कूलों की छवि भी खराब होती है और अभिभावकों का विश्वास कमजोर पड़ता है। बावजूद इसके यह सब किसकी देख-रेख में हो रहा है।
उच्च अधिकारियों ने इस पर क्यों अपनी आंखें मूंद रखी है। कानून बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है। कागज़ों पर योजनाएं हैं, बजट है, घोषणाएं हैं। इसके बाद भी जमीनी स्तर पर यदि कक्षाएं समय पर नहीं लगतीं, शिक्षक पर्याप्त नहीं हैं या बुनियादी सुविधाएं अधूरी हैं, तो शिक्षा का अधिकार अधूरा रह जाता है। जब स्कूल से जुड़ी खबरों में यह सामने आता है कि बच्चों से सफाई कराई जा रही है, निर्माण कार्य में लगाया जा रहा है, मानसिक दबाव डाला जा रहा है या योजनाओं का लाभ उन तक नहीं पहुंच रहा तो सवाल उठता है: आखिर जिम्मेदार कौन है?
कई मामलों में स्थानीय स्तर पर प्रधानाध्यापक या स्कूल प्रबंधन संसाधनों की कमी का हवाला देकर बच्चों से गैर-शैक्षणिक कार्य करा लेते हैं। यदि ऐसा हो रहा है, तो यह सीधा-सीधा नियमों और बाल अधिकारों का उल्लंघन है। जब शिक्षा विभाग नियमित निरीक्षण नहीं करता, शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई नहीं होती, या बजट का सही उपयोग नहीं होता तो ऐसा ही होता है। निरीक्षण तंत्र की कमजोरी भी अप्रत्यक्ष रूप से शोषण को बढ़ावा देती है। ऐसे में बच्चों का भविष्य खराब न हो, इसके लिए सरकार को कुछ सोचना चाहिए।




