Friday, March 6, 2026
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हाईकोर्ट की बार–बार फटकार के बाद भी क्यों नहीं हो रहा स्कूलों में सुधार

जर्जर स्कूल भवनों पर काम नहीं हो रहा। हाईकोर्ट तक ने सख्त नाराजगी जताते हुए कह दिया है कि जुलाई से लेकर अब तक केवल चार स्कूलों में काम शुरू हुआ है। मार्च में बजट लेप्स हो रहा है। हाईकोर्ट की चिंता जायज है। तकरीबन एक साल से सरकारी स्कूलों को लेकर हल्ला मचा हुआ है।

प्रतीक चौवे, संपादक

जर्जर स्कूल भवनों पर काम नहीं हो रहा। हाईकोर्ट तक ने सख्त नाराजगी जताते हुए कह दिया है कि जुलाई से लेकर अब तक केवल चार स्कूलों में काम शुरू हुआ है। मार्च में बजट लेप्स हो रहा है। हाईकोर्ट की चिंता जायज है। तकरीबन एक साल से सरकारी स्कूलों को लेकर हल्ला मचा हुआ है। कई स्कूलों की छतें तक गिर गईं, सर्वे में ढेरों स्कूल भवन पूरी तरह अनफिट घोषित कर दिए गए। कुछ स्कूलों के बच्चों को अन्यत्र शिफ्ट भी किया गया। बावजूद इसके अभी भी सैकड़ों स्कूलों के हालात अच्छे नहीं हैं। एक-दो कक्षा कक्ष बंद करके ही खतरे से नहीं बचा जा सकता। मरम्मत व रंग-रोगन करने से ही जर्जर भवन ठीक नहीं होने वाले।

हाईकोर्ट ने तो यहां तक कह दिया कि सरकार अभी तक केवल टेंडर कर रही है। सरकार की प्राथमिकता में स्कूल हैं या नहीं? बजट सरकार की समस्या है, हमारी नहीं। आदेश की पालना होनी चाहिए। सरकारी स्कूलों की बदहाल व्यवस्था को लेकर समय-समय पर हाईकोर्ट की चिंता सामने आती रही है। सरकार और शिक्षा विभाग को कई बार चेतावनी दी जा चुकी है। अदालत का कहना है कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई देती है।

सवाल यही है कि आखिर बार-बार की चेतावनी के बावजूद सरकारी स्कूलों की हालत में सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है। सैकड़ों सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां जर्जर भवन, शौचालयों की खराब स्थिति, पेयजल की व्यवस्था का अभाव और पढ़ाई के लिए पर्याप्त संसाधनों की कमी जैसी समस्याएं आम हैं। इनमें सबसे बड़ी समस्या जर्जर भवन की है, जहां स्कूली बच्चे ही सुरक्षित नहीं हों वहां पढ़ाई कैसे होगी। राज्य सरकार के सर्वे के अनुसार प्रदेश में 3,768 सरकारी स्कूल भवन पूरी तरह जर्जर पाए गए हैं। इनमें से 2,558 भवनों को आधिकारिक रूप से जर्जर घोषित किया जा चुका है, जबकि बाकी को भी खतरनाक स्थिति में माना गया है। इतना ही नहीं, 83 हजार से अधिक कक्षाएं और हजारों शौचालय भी जर्जर हालत में हैं और बड़ी संख्या में कमरों को मरम्मत की जरूरत है। दरअसल यह समस्या नई नहीं है। कई वर्षों से स्कूलों के भवनों की मरम्मत और नए निर्माण की मांग उठती रही है, लेकिन योजनाएं अक्सर कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं। जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं हो जाता, तब तक व्यवस्था की नींद नहीं खुलती।

झालावाड़ में स्कूल की छत गिरने से बच्चों की मौत की घटना ने भी इस सच्चाई को उजागर किया था कि जर्जर भवनों में पढ़ाई कराना बच्चों की जान से खिलवाड़ है। इसके बाद हल्ला भी खूब मचा, सरकार ने भी कई घोषणाएं की, बावजूद इसके अभी भी ढेर सारे स्कूल जर्जर भवन में ही चलाए जा रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि सरकार स्कूल भवनों की मरम्मत और निर्माण को प्राथमिकता दे। समयबद्ध योजना बनाकर जर्जर भवनों को हटाया जाए, नए भवन बनाए जाएं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों से नहीं बल्कि सुरक्षित और बेहतर वातावरण से भी मजबूत होती है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर जनता का भरोसा और कमजोर होगा। हाईकोर्ट की चेतावनी को केवल औपचारिक टिप्पणी समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। यह बच्चों के भविष्य से जुड़ा गंभीर सवाल है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो बच्चों के हित के तमाम सरकारी दावे झूठे माने जाएंगे।

Prateek Chauvey
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माननीय प्रतीक चौबे जी(Prateek Chauvey ) द्वारा प्रस्तुत यह मंच जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और प्रेरणा भरने का प्रयास है। यहाँ दी गई जानकारी आपकी व्यक्तिगत और व्यावसायिक यात्रा में सहायक होगी, आपको नई सोच के साथ बदलाव और सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचने के लिए प्रेरित करेगी।
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