संपादक: प्रतीक चौवे
हर बीमार को बिना आर्थिक बोझ के समय पर इलाज की सरकारी कोशिश आधी-अधूरी है। सरकार निजी अस्पतालों की मनमानी को रोक ही नहीं पा रही और सरकारी अस्पतालों के हाल सुधर नहीं रहे। मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना का कार्ड बहुत से निजी अस्पतालों में चल ही नहीं रहा तो राजस्थान सरकार स्वास्थ्य योजना (RGHS) के तहत भी उपचार अब ‘दया’ बनता जा रहा है। दुनिया के कई देशों में शिक्षा और चिकित्सा पूरी तरह फ्री है। अपने देश में भी इसकी कोशिश तो हुई पर यह कामयाब नहीं हो पा रही। आलम यही है कि इसे पूरी तरह लागू नहीं करने के लिए भी अस्पतालों को स्वतंत्र छोड़ रखा है। आरटीई (शिक्षा का अधिकार) भी बहुत से बच्चों को फायदा नहीं पहुंचा पा रहा है। सरकार की कोशिश सफल क्यों नहीं हो पा रही, इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है?
टोकन मनी पर जमीन लेकर भव्य इमारत बनाकर स्कूल-अस्पताल चलाने वाले ‘कारोबारियों’ पर जोर चल ही नहीं रहा। रियायती जमीन लेते समय के तमाम तय नियम कूड़ेदान में फेंक दिए गए। आखिर ऐसा हो क्यों रहा है, इनकी मॉनिटरिंग क्यों नहीं हो रही? एक्शन क्यों नहीं लिया जा रहा? अस्पतालों का आरोप है कि फ्री इलाज की सुविधा क्यों दें, जब बिल पास होने में ही कई साल लग जाएं। भुगतान में देरी के कारण कई अस्पताल या तो योजना से बाहर हो चुके हैं या फिर RGHS मरीजों को भर्ती करने से कतराते हैं। मरीजों को मजबूरी में या तो लंबा इंतजार करना पड़ता है या अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है-जो योजना के मूल उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत है। मरीज सरकारी कर्मचारी हो या आम आदमी, सरकार ने इन्हें राहत देने के लिए ही तो स्वास्थ्य योजना चालू की थी। बावजूद इसके उद्देश्य पूरा ही नहीं हो रहा। सरकार की ओर से समय-समय पर सुधार के दावे किए जाते हैं, लेकिन हालात में ठोस बदलाव नजर नहीं आता। बड़े और विशेषज्ञ अस्पतालों की ऐसी योजना से दूरी अचंभित करने वाली है।
योजनाओं की निगरानी और शिकायत निवारण तंत्र कमजोर है। मरीज परेशान होता है, लेकिन जिम्मेदारी तय नहीं होती। निजी स्कूल हो या अस्पताल, ये सरकार के कहने से नहीं चल रहे या इन्हें कहा ही नहीं जाता। निजी अस्पताल अनाप-शनाप बिल वसूलते हैं तो स्कूल भी ऐसा ही करते हैं। समय-समय पर मुद्दे उठते हैं, हंगामा मचता है तो सरकार सुधार करने का वादा कर लेती है पर बाद में सब कुछ ज्यों का त्यों। सरकार को जिम्मेदारी निभानी होगी, स्वास्थ्य हो या शिक्षा, यह सहज सुलभ हो, इसकी जवाबदेही तय करनी होगी। अस्पताल हो या स्कूल, मनमानी फीस वसूल न करें, गरीब-जरुरतमंदों को तय नियमों के मुताबिक राहत दें, सभी सरकारी योजना के तहत संचालित हों, इसकी व्यवस्था भी सरकार को ही करनी चाहिए।



