वॉशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान युद्ध को लेकर उत्तर अटलांटिक संधि संगठन और प्रमुख सहयोगी देशों पर कड़ा रुख अपनाया है। व्हाइट हाउस में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि संघर्ष के समय अमेरिका को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। जब अमेरिका को सहयोग की आवश्यकता थी, तब नाटो सहित जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने सक्रिय मदद से दूरी बनाए रखी। उन्होंने कहा कि इस अनुभव ने उनकी सोच पर गहरी छाप छोड़ी है, जिसे वह कभी नहीं भूल पाएंगे।
राष्ट्रपति ने नाटो की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे कमजोर बताया और कहा कि यह संगठन अपने उद्देश्य के अनुरूप प्रभावी साबित नहीं हुआ। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ग्रीनलैंड को लेकर उनके प्रस्ताव के विरोध के बाद से अमेरिका और नाटो के बीच मतभेद बढ़ने लगे। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि युद्ध में सफलता के बाद अब वही देश अमेरिका के साथ जुड़ने और सहयोग की पेशकश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कई नेता उनसे मिलने की इच्छा जता रहे हैं और अब समर्थन देने की बात कर रहे हैं।
इसके अलावा, उन्होंने एशिया में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि जापान और दक्षिण कोरिया में बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जो इन देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। इसके बावजूद, युद्ध के समय इन देशों की ओर से समर्थन न मिलना निराशाजनक रहा। उत्तर कोरिया के संदर्भ में ट्रंप ने कहा कि उनके नेता किम जोंग उन के साथ उनके संबंध सकारात्मक हैं। साथ ही उन्होंने पूर्व अमेरिकी प्रशासन पर भी अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधते हुए कहा कि अगर पहले सही कदम उठाए गए होते, तो स्थिति अलग हो सकती थी।
ट्रंप ने हाल के दिनों में अपनी भाषा और बयानों को लेकर हो रही आलोचनाओं को भी खारिज किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें आलोचनाओं से कोई फर्क नहीं पड़ता और वह अपने तरीके से देश के हित में फैसले लेते रहेंगे। इस बयान के साथ ही अमेरिका और नाटो के रिश्तों में बढ़ती दूरी एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है, खासकर ऐसे समय में जब नाटो के महासचिव के वॉशिंगटन दौरे की तैयारी चल रही है।



