प्रतीक चौवे, संपादक
गाजियाबाद में तीन बहनों ने नवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। कम उम्र में ऑनलाइन गेम का चस्का उनकी जान ले बैठा, ऐसा बताया जा रहा है। पुलिस अपनी जांच में लगी है तो माता-पिता के पास सिवाय रोने के और बचा भी क्या है? सुसाइड करने से पहले सॉरी लिखने वाली बच्चियों को आखिर यह कदम क्यों उठाना पड़ा, इसकी पड़ताल की जा रही है। एक घर की खुशियां बच्चों से ही होती है, उनके असमय चले जाने का दर्द समझा जा सकता है। यह भी सही है कि कम उम्र में आत्महत्या करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। कहीं पढ़ाई के दबाव में तो कहीं मामूली सी डांट-फटकार के चलते बच्चे यह कदम उठा रहे हैं। उस पर ऑनलाइन गेमिंग भी इसकी बड़ी वजह बनता जा रहा है।
गाजियाबाद में आत्महत्या करने वाली बहनें, निशिका (16), प्राची (14) और पाखी (12) पिछले दो साल से स्कूल नहीं जा रही थीं, कोरोना काल से ही उनको मोबाइल का चस्का लग गया था। गेमिंग कब शुरू की यह तो पता नहीं पर वे हमेशा अलग कमरे में इसी में व्यस्त रहा करती थीं। तीनों बहनों का साथ होना यह भी बताता है कि वे एक-दूसरे का भावनात्मक सहारा भी थीं और चिंता भी। ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, डेनमार्क जैसे देशों में सोलह साल तक के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर करने की कवायद की जा रही है। कुछ देशों में तो यह प्रतिबंध लगा भी दिया है। भारत के भी कुछ राज्यों में इसके प्रयास शुरू हो गए। आज का सबसे बेचैन करने वाला सवाल यही है कि बच्चे इतनी कम उम्र में ऐसे कौनसे गेम के मकड़जाल में फंस रहे हैं जो उनको आत्महत्या करने तक के लिए मजबूर कर देता है।
यह भी सही है कि मोबाइल के नशे ने बच्चों का बचपन छीन लिया। खेल का मैदान सिकुड़ गया , संवाद कम हुआ और अपेक्षाएं बढ़ी। ऐसे में गेम एक आसान रास्ता देता है—जहां तुरंत जीत है, सराहना है और कोई डांट-फटकार नहीं। बच्चों को मोबाइल नहीं देने पर होने वाला क्लेश घर-घर की कहानी बन चुका है। बच्चों को नाराज नहीं करने के चलते भी पेरेंटस उन्हें मोबाइल दिलाकर खुश हो रहे हैं। बच्चा मोबाइल में कर क्या रहा है, इस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा। बच्चों की आत्महत्याओं के बढ़ते मामले हमारे लिए बड़ी चेतावनी हैं। यह केवल कुछ परिवारों का निजी दुख नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जिसमें हम अपने बच्चों को बड़ा कर रहे हैं। जिस उम्र में सपने बनने चाहिए, उस उम्र में जीवन से हार मान लेना बताता है कि कहीं न कहीं हम सब चूक रहे हैं।
असल में बच्चों ने मोबाइल को सबकुछ समझ लिया है, घरों में बच्चे अपने माता-पिता से बात कम करते हैं, उनका पूरा ध्यान मोबाइल गेम में उलझा रहता है। उन्हें इसके लिए मना करो तो रोना शुरू कर देते हैं। ऑनलाइन गेमिंग अब केवल मनोरंजन नहीं रही, यह बच्चों और किशोरों के जीवन में चुपचाप एक खतरनाक लत का रूप लेती जा रही है। मोबाइल स्क्रीन पर दिखने वाला रंगीन खेल कब मानसिक दबाव, अकेलेपन और आत्मघाती सोच में बदल जाता है, अक्सर इसका अंदाजा तब लगता है, जब बहुत देर हो चुकी होती है। आज के कई ऑनलाइन गेम इस तरह डिज़ाइन किए जाते हैं कि खिलाड़ी बार-बार लौटे। लेवल, रिवॉर्ड, वर्चुअल सिक्के, जीत-हार का दबाव, ये सब बच्चों के दिमाग पर सीधा असर डालते हैं। कम उम्र का मन हार को सहन नहीं कर पाता और धीरे-धीरे खुद को असफल मानने लगता है। मानसिक स्वास्थ्य पर अब भी संकोच है। काउंसलिंग को कमजोरी माना जाता है।
बच्चे यह सीख लेते हैं कि ‘मजबूत’ दिखना ज़रूरी है, चाहे भीतर कितना भी टूटन क्यों न हो। यही सोच जानलेवा बन सकती है। बच्चों को डांट-फटकार से समझाने की प्रथा भी अब लुप्त प्राय होती जा रही है। स्कूलों में डिजिटल साक्षरता और मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा। काउंसलिंग को ‘कमजोरी’ नहीं, सहारा समझा जाए। माता-पिता को भी निगरानी के साथ भरोसेमंद संवाद विकसित करना होगा, सवाल पूछने से पहले सुनना सीखना होगा। सरकार को नीति, निगरानी और जन-जागरूकता अभियानों के जरिए इस संकट को गंभीरता से लेना चाहिए। पेरेंट्स को भी बच्चों पर नजर रखनी होगी।




