US Iran Ceasefire : मेलबर्न। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच प्रस्तावित दो सप्ताह के युद्धविराम ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बड़ी राहत दी है। इससे कुछ ही घंटे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को “पाषाण युग” में पहुंचाने और उसकी “सभ्यता नष्ट” करने की कड़ी चेतावनी दी थी, जिससे वैश्विक स्तर पर गहरी चिंता पैदा हो गई थी। ट्रंप का कहना है कि यह युद्धविराम ईरान के साथ “दीर्घकालिक शांति” की दिशा में एक निर्णायक समझौते के लिए बातचीत का अवसर प्रदान कर सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि स्थायी समाधान तक पहुंचने की राह आसान नहीं होगी। क्षेत्रीय हितों, सुरक्षा चिंताओं और आपसी अविश्वास के कारण यह प्रक्रिया जटिल और उतार-चढ़ाव भरी रह सकती है, भले ही शांति की संभावना पूरी तरह खत्म न हो।
दुश्मन को कम आंकना
छह सप्ताह तक चले संघर्ष की शुरुआत 28 फरवरी को अमेरिका-इजराइल के संयुक्त हमलों और ईरान की जवाबी कार्रवाई से हुई और इस संघर्ष में तीनों पक्षों ने एक-दूसरे को गंभीर नुकसान पहुंचाया। तेहरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य बंद किए जाने से वैश्विक तेल, गैस और महंगाई का संकट गहरा गया। ट्रंप को शुरु में उम्मीद थी कि अमेरिका और इजराइल की संयुक्त सैन्य ताकत तेजी से जीत हासिल कर लेगी और ईरान सरकार को झुकने पर मजबूर कर देगी। लेकिन ईरान अपेक्षा से अधिक मजबूत, संगठित और रणनीतिक रूप से सक्षम साबित हुआ। उसने फारस की खाड़ी और इजराइल में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया और जलडमरूमध्य बंद कर दबाव बनाया। इस बीच, ट्रंप अपने सहयोगी देशों से अपेक्षित समर्थन हासिल नहीं कर सके। कई देशों ने इस युद्ध को अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के खिलाफ मानते हुए इसमें भागीदारी से इनकार कर दिया।
बढ़ती लागत
अमेरिका के वैश्विक प्रतिद्वंद्वी रूस और चीन ने भी युद्ध का विरोध किया और तनाव कम करने की अपील की। संघर्ष के विस्तार के साथ इजराइल ने लेबनान में हिज़बुल्ला के खिलाफ अभियान तेज कर दिया। युद्ध की लागत तेजी से बढ़ी। अमेरिका के लिए इसका खर्च प्रतिदिन करीब एक अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिससे पहले से ही भारी संघीय कर्ज में और इजाफा हुआ। वहीं, इजराइल को भी सैन्य संसाधनों और मानवबल की कमी का सामना करना पड़ा। स्थिति मिसाइलों और इंटरसेप्टरों की होड़ में बदल गई, जहां यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया कि पहले किसके संसाधन खत्म होंगे।
अमेरिका में युद्ध को लेकर त्यौरियां तनीं
दूसरी ओर, नेतृत्व पर हमलों और भारी बमबारी के बावजूद ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने जवाबी हमले जारी रखे और खाड़ी क्षेत्र तथा इजराइल पर नियमित रूप से मिसाइल और ड्रोन हमले किए। अमेरिका में यह युद्ध धीरे-धीरे अलोकप्रिय होता गया। बढ़ती महंगाई और ईंधन कीमतों के असर के चलते करीब 61 प्रतिशत नागरिकों ने इसका विरोध किया और ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट आई। इन परिस्थितियों में ट्रंप के लिए युद्ध को और तेज करने का वादा निभाना कठिन हो गया। ईरान की सांस्कृतिक, राष्ट्रीय और धार्मिक एकजुटता ने बाहरी दबाव के खिलाफ उसे मजबूत बनाए रखा।
आगे की राह
युद्ध विराम के बाद व्यापक और स्थायी शांति समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा। ट्रंप के अनुसार, ईरान के 10 सूत्रीय प्रस्ताव और अमेरिका के 15 सूत्रीय प्रस्ताव के बीच कई मुद्दों पर सहमति बन चुकी है और यह बातचीत का आधार बन सकता है। इन प्रस्तावों में सभी मोर्चों पर संघर्ष विराम, होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का नियंत्रण, प्रतिबंधों को हटाना और शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम को मान्यता देना शामिल है। हालांकि, इजराइल ने लेबनान को युद्धविराम के दायरे में शामिल मानने से इनकार किया है।
अब यह डोनाल्ड ट्रंप की जिम्मेदारी है कि वे बेंजामिन नेतन्याहू को साथ लेकर चलें, जिन्होंने लंबे समय से न केवल ईरानी सरकार को कमजोर करने, बल्कि उसे क्षेत्रीय शक्ति के रूप में कमतर करने का प्रयास किया है। ट्रंप के सामने यह एक तरह से चुनौती है। यदि सभी पक्ष ईमानदारी से बातचीत करें, तो क्षेत्र में एक नए संतुलित और सहयोगात्मक सुरक्षा ढांचे की संभावना बन सकती है।



