Thursday, February 12, 2026
HomeNational Newsसड़क हादसे रोकने हैं तो समझाइश के साथ सख्ती भी जरूरी

सड़क हादसे रोकने हैं तो समझाइश के साथ सख्ती भी जरूरी

देश में बढ़ते सड़क हादसे गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं। तेज रफ्तार, नियमों की अनदेखी, शराब पीकर ड्राइविंग, हेलमेट व सीट बेल्ट नहीं लगाने और खराब सड़कों के कारण रोज जानें जा रही हैं। सड़क सुरक्षा अभियान औपचारिक बनकर रह गए हैं।

प्रतीक चौवे, संपादक

दौसा के सिकंदरा में कार में सवार 6 दोस्तों की सड़क हादसे में मौत हो गई तो श्रीगंगानगर में एक इंस्पेक्टर को भी दुर्घटना में जान गंवानी पड़ी। कानपुर की वीआईपी रोड पर एक लग्ज़री लेम्बोर्गिनी ने 6 जनों को टक्कर मार दी। बढ़ते हादसे यह बताने के लिए काफी हैं कि चालक नियम-कायदों से बेपरवाह हैं। देशभर में हादसे दिन दूने-रात चौगुने बढ़ते जा रहे हैं, इन्हें रोकने की तमाम कोशिश बेकार साबित हो रही है। राजस्थान में औसतन हर दिन लगभग 75 सड़क हादसे होते थे और करीब 40 लोग अपनी जान गंवाते थे। साल 2025 में भी मौजूदा रिपोर्टों के अनुसार लगभग 9,700 से अधिक मौतें दर्ज हो चुकी हैं, जो पिछले वर्षों की तुलना में गंभीर समस्या का संकेत है।

हर वर्ष सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया जाता है। स्कूलों में रैलियां निकलती हैं, ट्रैफिक पुलिस जागरूकता अभियान चलाती है, हेलमेट वितरण होते हैं, और नियमों का पालन करने की अपील की जाती है। कुछ दिनों तक सड़कों पर सख्ती भी दिखती है। इसके बाद सबकुछ पुराने ढर्रे पर चलने लगता है। जनता सच में कुछ सीखती है, या यह अभियान महज औपचारिकता है। सड़क सुरक्षा सप्ताह हमें यह सिखाता है कि जीवन की कीमत किसी भी जल्दबाजी से कहीं अधिक है। इसके बाद भी लोग समझ नहीं पा रहे। अधिकांश दुर्घटनाएं तेज रफ्तार के कारण होती हैं। लंबी और सीधी हाईवे सड़कें वाहन चालकों को रफ्तार के लिए उकसाती हैं, लेकिन नियंत्रण खोने पर परिणाम घातक होता है। हेलमेट और सीट बेल्ट का उपयोग अभी भी व्यापक नहीं है। कई दोपहिया चालक बिना हेलमेट और तीन-तीन सवारियों के साथ चलते दिखाई देते हैं। शादी-ब्याह, त्योहार और सामाजिक आयोजनों के बाद शराब पीकर वाहन चलाना एक बड़ी वजह बन रहा है। ब्लैक स्पॉट, गड्ढे, अधूरी रोशनी, गलत डिजाइन वाले मोड़ और संकेतकों की कमी दुर्घटनाओं को बढ़ा रही है। दुर्घटना के बाद तुरंत इलाज न मिल पाने से मौतों की संख्या बढ़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या अधिक गंभीर है।

ओवरस्पीडिंग, नशे में ड्राइविंग और बिना हेलमेट/सीट बेल्ट पर जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई जाए। चालान केवल राजस्व का साधन न बने, बल्कि सुधार का माध्यम हो। ड्राइविंग लाइसेंस को औपचारिकता न रहने दिया जाए। कड़ा टेस्ट और नियमित रिफ्रेशर कोर्स हों। स्कूल-कॉलेजों में सड़क सुरक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए ताकि नई पीढ़ी नियमों को संस्कार की तरह अपनाए। ओवरस्पीडिंग, नशे में ड्राइविंग और बिना हेलमेट/सीट बेल्ट पर सख्ती दिखानी होगी। प्रभावशाली व्यक्ति हो या आम नागरिक—कानून सब पर समान रूप से लागू हो। ई-चालान और स्पीड कैमरों का दायरा गांवों और कस्बों तक बढ़ाया जाए। यही नहीं ड्यूटी पर तैनात पुलिस के साथ परिवहन विभाग के कारिंदे जिम्मेदारी समझें। हादसे में घायल को तुरंत राहत मिले, इसके लिए प्रशासन के साथ आम लोगों को भी जागना होगा। मंजिल तक पहुंचने के लिए लापरवाही-जल्दबाजी से बहुत कुछ खो जाता है। जरा सी गलती एक परिवार का बहुत कुछ तबाह कर देती है। स्कूल से लेकर गली-मोहल्लों तक जागरूकता फैलानी चाहिए। लापरवाही बरतने वालों पर सख्ती भी जरूरी है।

Prateek Chauvey
Prateek Chauveyhttps://jagoindiajago.news/
माननीय प्रतीक चौबे जी(Prateek Chauvey ) द्वारा प्रस्तुत यह मंच जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और प्रेरणा भरने का प्रयास है। यहाँ दी गई जानकारी आपकी व्यक्तिगत और व्यावसायिक यात्रा में सहायक होगी, आपको नई सोच के साथ बदलाव और सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचने के लिए प्रेरित करेगी।
RELATED ARTICLES
- Advertisment -
Google search engine

Most Popular