प्रतीक चौवे, संपादक
आम आदमी की रेल यात्रा अब भी मुश्किलों भरी है। ट्रेनों की संख्या बढ़ रही है पर सुविधाएं नहीं। देरी से आने-पहुंचने की पुरानी ‘परंपरा’ अब भी यथावत है। सस्ता सफर महंगा हुआ पर साधारण यात्री को बैठने के लिए जगह मिलना अब भी संभव नहीं हो पा रहा। सरकार के अपने दावे हैं तो यात्रियों की अपनी पीड़ा, सुधार हो नहीं रहा या इसकी कोशिश ही नहीं की जा रही । स्टेशन के सौंदर्यीकरण कर देने मात्र से तो यात्रियों की दुविधा दूर नहीं होने वाली, इस बात को समझने की आवश्यकता है।
तेज रफ्तार ट्रेनें, वंदे भारत और आधुनिक स्टेशनों की तस्वीरों के बीच हकीकत यह है कि आम रेलयात्री अव्यवस्था, भीड़ और असुविधाओं से जूझ रहा है। सबसे बड़ी समस्या बढ़ती भीड़ और सीमित क्षमता की है। आबादी बढ़ी, यात्रा की मांग बढ़ी, लेकिन ट्रेनों और कोचों की संख्या उस अनुपात में नहीं बढ़ पाई। आरक्षित टिकट मिलना कठिन होता जा रहा है और वेटिंग लिस्ट यात्रियों के लिए स्थायी संकट बन चुकी है। मजबूरी में लोग जनरल डिब्बों में जान जोखिम में डालकर सफर करते हैं। ट्रेनों के भीतर सुविधाओं की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। एसी और स्लीपर कोचों में भी खराब शौचालय, पानी की कमी, टूटे उपकरण और सुरक्षा संबंधी चिंताएं आम हैं। खानपान की गुणवत्ता और कीमतें अक्सर सवालों के घेरे में रहती हैं। शिकायत प्रणाली मौजूद है, लेकिन समाधान समय पर और प्रभावी नहीं हो पाता।
रेलवे का फोकस धीरे-धीरे आम यात्री से हटकर प्रीमियम यात्रियों और माल ढुलाई की ओर झुकता दिख रहा है। महंगी ट्रेनों और परियोजनाओं पर जोर है, जबकि साधारण यात्रियों की रोजमर्रा की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। हकीकत यह है कि ट्रेनों के बढ़ने से भीड़ कम नहीं हुई। आरक्षित टिकट मिलना अब भी चुनौती है और जनरल डिब्बों में हालात बदतर हैं। कई रूटों पर यात्री संख्या बढ़ी, लेकिन कोच नहीं बढ़े। नतीजा—ठसाठस भरे डिब्बे, असुरक्षित सफर और यात्रियों के बीच बढ़ता तनाव। नीतिगत स्तर पर भी प्राथमिकताएं स्पष्ट नहीं दिखतीं।
नई ट्रेनों और हाई-प्रोफाइल परियोजनाओं पर जोर है, लेकिन रखरखाव, कोचों की संख्या बढ़ाने और कर्मचारियों की कमी दूर करने पर अपेक्षित ध्यान नहीं। यात्री सुविधा के नाम पर घोषणाएं तो होती हैं, पर जमीनी हकीकत नहीं बदलती। ट्रेनें देर से चलती हैं, यात्रियों को सही जानकारी समय पर नहीं मिलती, जिससे असुविधा और नाराजगी बढ़ती है। शिकायत दर्ज तो होती है, लेकिन समाधान देर से या अधूरा होता है। जवाबदेही तय नहीं हो पाती। इसके लिए सुधार पर ध्यान देना होगा। नई ट्रेनें चलाने के साथ-साथ मौजूदा ट्रेनों में स्लीपर और जनरल कोच बढ़ाए जाएं। भीड़ वाले रूटों पर विशेष ट्रेनें नियमित रूप से चलाई जाएं।
प्रीमियम सेवाओं के साथ साधारण यात्रियों की सुविधाओं पर बराबर ध्यान दिया जाए। कोचों की नियमित जांच, सफाई कर्मचारियों की जवाबदेही और निगरानी तंत्र को सख्त बनाया जाए। ट्रेनों की देरी की सही और समय पर जानकारी यात्रियों को मिले। तकनीक का उपयोग यात्रियों की सुविधा के लिए हो, केवल आंकड़ों के लिए नहीं। शिकायत का समयबद्ध समाधान हो और फीडबैक को गंभीरता से लिया जाए। अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। रेल लाखों लोगों की रोजमर्रा की जरूरत है। समस्याएं नई नहीं हैं, समाधान भी असंभव नहीं। परेशानियां दूर करने के लिए प्रयास किए जाएं। रेल यात्रा मुश्किल नहीं आसान लगने लगे, ऐसी कोशिश होनी चाहिए।




