प्रतीक चौवे, संपादक
पुणे–मुंबई एक्सप्रेसवे पर 32 घंटे तक चला लंबा ट्रैफिक जाम, जाम में फंसे हजारों लोगों की मुश्किलों को समझा जा सकता है। अनगिनत जरूरी काम अटके या रद्द हो गए। बताया जाता है कि गैस से भरा एक टैंकर नियंत्रण खो बैठा और पलट गया। इससे टैंकर के ऊपरी वाल्व टूट गए और गैस लीक होने लगी। रिसते गैस के कारण सेफ्टी के लिहाज से वाहनों को दोनों दिशाओं में रोका गया ताकि किसी भी छोटी चिनगारी से आग न लगे। सुरक्षा के लिए यह जरूरी था पर इसमें इतने घंटे लग गए। देश में हालात कुछ ऐसे ही है, हाईवे हो या शहरों के भीतर की सड़कें, पग-पग पर लगने वाले जाम अब आमजन की मुसीबत बनते जा रहे हैं।
बेंगलुरु, पुणे, मुंबई, दिल्ली और कोलकाता, दुनिया के सबसे ज्यादा जामग्रस्त शहरों की सूची में शामिल हैं। जयपुर भी इन्हीं टॉप तीस सिटी में आ गया है जबकि देश में ट्रैफिक जाम के मामले में यह छठे नंबर पर है। बड़े शहरों में ट्रैफिक जाम अब सिर्फ परेशानी नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। घंटों तक सिग्नल पर अटके रहना और धीरे-धीरे रेंगती गाड़ियां अब आम हो गई हैं। ऐसे शहरों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है जहां दिन में ही नहीं रात को भी वाहनों का ‘शोर’ आदत में शुमार हो गया है। सख्त नियम भी ना प्रदूषण कम कर पाए ना ही बहुत से चालकों को सलीके से गाड़ी चलाने की आदत डाल पाए। ऑनलाइन चालान के बावजूद भी अनावश्यक कार्रवाई लोगों के लिए परेशानी का सबब बन चुका है।
ट्रैफिक इंडेक्स की रिपोर्ट पर ही गौर करें तो विश्व स्तर पर शीर्ष पांच सबसे धीमे शहरों में तीन भारत के हैं। कोलकाता शहर देश का सबसे अधिक ट्रैफिक वाला शहर है जिसे दुनिया का सबसे धीमा शहर माना गया है। यहां दस किलोमीटर की दूर तय करने में 34 मिनट और 33 सेकण्ड लगते हैं जो सर्वाधिक हैं। कर्नाटक का बेंगलुरु और महाराष्ट्र का पुणे दुनिया में तीसरे और चौथे स्थान पर हैं। अब यही हाल जयपुर समेत कई बड़े शहरों का होने लगा है। जयपुर अभी बेंगलुरु–पुणे नहीं बना है, लेकिन उसी दिशा में बढ़ रहा है। वाहनों की बढ़ती भीड़ का आलम यह है कि हर शहर में पार्किंग तक के लिए जगह की मारामारी है। ट्रैफिक पुलिसकर्मियों की कार्रवाई ऐसी बेतुकी है कि कई बार आम आदमी को नियम-कायदों तक से भराेसा उठ जाता है। मसलन देश के अनगिनत शहरों में नो पार्किंग के बोर्ड लगाए जाते हैं। यदा-कदा बोर्ड नहीं भी हों तो वहां खड़े वाहनों को नो पार्किंग का हवाला देते हुए उठवा लिया जाता है। अब हालत यह है कि उसके आसपास दूर तक पार्किंग के लिए स्थान ही उपलब्ध नहीं होता। ना ही संबंधित व्यक्ति के पूछने पर बताया जाता है कि पार्किंग स्थल आसपास है कहां। ऑनलाइन चालान होने लगे हैं यानी जगह-जगह लगे कैमरों से वाहन चालक के नियमों की अवहेलना रिकॉर्ड हो जाती है। ऑनलाइन चालान तक घर भेज दिया जाता है तो वाहन जब्त करने की कार्रवाई की जरुरत कहां है।
जयपुर-दिल्ली जैसे कई बड़े शहरों में क्रेन के जरिए वाहन उठाने की ‘ठेकेदारी’ को वाजिब कैसे ठहराया जा सकता है। गाड़ी उठने के बाद व्यक्ति साधन विहीन हो जाता है, मानसिक परेशान होता है सो अलग। वाहनों की भीड़ में पैदल चलने वालों का तो हाल बेहाल है। सड़क पार करने में ही उनकी जान निकल जाती है। पैदल यात्रियों की सुरक्षा पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर में राहगीरों की मौत की संख्या दोगुनी हो गई है। सड़कों को सुरक्षित बनाने और राहगीरों के लिए बेहतर इंतजाम करने का जिम्मा भी तो सरकार का है। ट्रैफिक स्थिति सुधरे, प्रदूषण ना बढ़े, समय के साथ लोगों की सेहत का ध्यान रखा जाए, इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। कौन से वाहन किस लेन में चलें, इसके लिए हाईवे से लेकर अन्य सड़कों पर वाहनों के चित्र अथवा कंपनियों की मार्केटिंग के जरिए राजस्व भी कमा सकती है।
जयपुर में ट्रैफिक की स्थिति भी अच्छी नहीं है। औसतन आधा घंटे में 10 किलोमीटर तय होते हैं। जैसे-जैसे शहरी क्षेत्रों का विस्तार हो रहा है, यातायात की भीड़भाड़ एक गंभीर समस्या बनती जा रही है जिस पर ध्यान देना ज़रूरी है। अधिक नियमन और टिकाऊ परिवहन विकल्पों की ओर रुख किए बिना, हम भीड़भाड़ की समस्या को और बदतर बनाने का जोखिम उठा रहे हैं जिसका असर हमारे शहरों में सभी पर पड़ेगा। ट्रैफिक कंट्रोल केवल पुलिस का काम नहीं। यह शहरी डिजाइन का सवाल है, फुटपाथ, साइकिल ट्रैक, बस लेन। जब पैदल और सार्वजनिक परिवहन सुरक्षित होगा, तभी निजी वाहन घटेंगे। जयपुर की सड़कों पर वाहन बढ़े, पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट का भरोसा नहीं बढ़ा। मेट्रो सीमित दायरे में है, बसें अनियमित, और पार्किंग नीति ढीली। नतीजा यह कि निजी वाहन शहर का बोझ ढो रहे हैं, और शहर निजी वाहनों का।




