प्रतीक चौवे, संपादक
लखनऊ में एक युवक ने अपने पिता की गोली मारकर हत्या कर दी। उनके शव के टुकड़े कर नीले ड्रम में भर दिए और बाद में उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने थाने पहुंच गया। कुछ समय पहले जयपुर में एक युवक ने अपनी मां की हत्या कर दी थी। भीलवाड़ा में शुक्रवार को एक पिता ने पहले पुत्र की हत्या की और बाद में खुद जहर खाकर जान दे दी। ऐसी घटनाओं में तेजी से इजाफा हो रहा है। जमीन के विवाद में भाई भाई को मार रहा है तो कहीं बेटा अपने पिता का मर्डर कर देता है। कहीं नशे के लिए पैसे नहीं मिलने पर मां को मार दिया जाता है तो कहीं मामूली गृह कलेश के चलते पिता की जान ले ली जाती है। कहीं पत्नी पति का कत्ल कर रही है तो कहीं पति पत्नी का।
आखिर ऐसी घटनाओं का बढ़ना वाकई चिंताजनक है। संयुक्त परिवारों के घटने और एकल परिवारों के बढ़ने से भावनात्मक सहारा कम हुआ है। पहले घर में बुजुर्ग, रिश्तेदार और सामाजिक दबाव कई बार टकराव को संभाल लेते थे। अब छोटे परिवारों में विवाद सीधे टकराव में बदल जाता है, और उसे सुलझाने वाला कोई बड़ा-बुजुर्ग अक्सर मौजूद नहीं होता। बेरोजगारी की चिंता, करियर का तनाव और बढ़ती अपेक्षाएं युवाओं पर भारी मानसिक दबाव डाल रही हैं। जब अपेक्षाएं और वास्तविकता के बीच खाई बढ़ती है, तो निराशा और कुंठा अपराध करा देती है। दु:खद तो यह है कि गुस्से का सबसे आसान निशाना वही लोग बनते हैं जो सबसे करीब होते हैं।
इसके साथ-साथ नशे का फैलाव परिवारों के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। शराब और मादक पदार्थ केवल स्वास्थ्य नहीं बिगाड़ते, बल्कि व्यवहार और निर्णय क्षमता को भी प्रभावित करते हैं। पारिवारिक हिंसा के अनेक मामलों में नशा एक बड़ी वजह बना। नशा इस पूरी स्थिति को बेहद खतरनाक बना देता है। शराब या अन्य मादक पदार्थ व्यक्ति की निर्णय क्षमता कमजोर करते हैं और आक्रामकता बढ़ाते हैं। पुलिस जांच में बार-बार सामने आया है कि कई पारिवारिक हत्याओं के समय आरोपी नशे में था या नशे का आदी था। नशा दबे हुए गुस्से को हिंसा में बदल देता है। नई पीढ़ी स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय चाहती है, जबकि कई परिवारों में पारंपरिक नियंत्रण की सोच बनी हुई है। छोटी-छोटी बातों पर होने वाले विवाद को जल्द खत्म करने की आवश्यकता है।
यह भी सही है कि अवसाद- तनाव से जूझ रहे लोगों को समय पर मदद नहीं मिल पाती। समाज में मानसिक बीमारी को लेकर कलंक अब भी इतना है कि परिवार भी इसे नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसे में कई बार बड़ी वारदातें जन्म लेती हैं। अपने ही अपनों का खून करना मानवता की गिरावट का बड़ा संकेत है। यह समय है जागरूक रहकर रिश्तों को बचाने का। इसके लिए हम सबको मिलकर पहल करनी होगी। विवाद के पीछे छिपे गुस्से को पहचानना होगा। आवश्यकता पड़ने पर समझौते करने होंगे। रिश्ते निभाने के लिए खुद को भी संभालना होगा।




