संपादक: प्रतीक चौवे
किसानों की कर्जमाफी नेताओं के लिए बड़ा मुद्दा रही है। कई बार कर्ज माफ हुआ भी तो राजनीतिक दल-नेता अपना क्रेडिट लेने में लगे रहे, किसानों की आर्थिक स्थिति कितनी सुधरी, इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। किसानों को सम्मान निधि योजना भी दी जा रही है। अपने-अपने ढंग से केन्द्र हो या राज्य सरकार, किसानों के हित में बड़े-बड़े दावे-वादे करते हैं पर हाल ही आरबीआई और विशेषज्ञों की रिपोर्ट ने पोल खोल कर रख दी। किसानों के हालात नहीं बदल रहे न ही इसके कोई ठोस उपाय ढूंढे जा रहे हैं। इसके बावजूद खेती आज भी घाटे का सौदा मानी जाती है, किसान आत्महत्या जैसी त्रासद घटनाएं रुक नहीं पाईं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चुनौतियां जस की तस बनी हुई हैं। खेती में लागत लगातार बढ़ रही है-बीज, खाद, डीजल, बिजली और मजदूरी सब महंगे हो रहे हैं। दूसरी ओर फसल का उचित मूल्य समय पर नहीं मिल पाता। मौसम की अनिश्चितता, बाजार की अस्थिरता और भंडारण-प्रसंस्करण की कमी किसानों को बार-बार संकट में धकेल देती है। ऐसे में कर्जमाफी केवल अस्थायी राहत देती है, लेकिन किसान फिर उसी दुष्चक्र में फंस जाता है।
किसानों के लिए कर्जमाफी की स्कीमों का सिलसिला जारी है। अब महाराष्ट्र ने अपने चुनावी वादे को पूरा करते हुए किसानों का कर्ज माफ करने वाली स्कीम की घोषणा की है। रिजर्व बैंक ने चेताया है कि अलग-अलग राज्यों में चुनावी वादे के तौर पर आने वाली कर्जमाफी की स्कीमों ने कृषि के क्षेत्र में क्रेडिट कल्चर को बर्बाद किया है। इससे किसानों को इस बात के लिए प्रोत्साहन मिलता है कि वह कर्ज न चुकाएं और कर्जमाफी स्कीमों का इंतजार करें। वहीं, इस तरह की स्कीमों को देखते हुए बैंक भी किसानों को कर्ज देने से कतराते हैं। केंद्र सरकार किसानों को सालाना 6,000 रुपये मुहैया करा रही है, लेकिन रकम बहुत कम है। ऐसे में सवाल है कि कर्जमाफी स्कीमों के बजाय केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर किसानों को नियमित वित्तीय मदद देने वाली योजनाएं क्यों नहीं लाती हैं, जिससे किसान आधुनिक खेती को अपना कर अपनी माली हालत को बेहतर बना सकें।
पिछले 35 वर्षों में केंद्र और राज्यों ने मिलकर लगभग 3 लाख करोड़ रुपए कृषि ऋणमाफी योजनाओं पर खर्च किए हैं। आरबीआई बार-बार कृषि ऋण माफी का विरोध करता रहा है। बारिश का कम या ज्यादा होना, ओलावृष्टि, सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं फसल को भारी नुकसान पहुंचाती हैं। जलवायु परिवर्तन से यह संकट और बढ़ गया है। बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल और मजदूरी सब महंगे होते जा रहे हैं। इसके मुकाबले फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता, जिससे खेती घाटे का सौदा बन जाती है। कई क्षेत्रों में आज भी पर्याप्त सिंचाई सुविधा नहीं है। बारिश पर निर्भर खेती जोखिम भरी होती है, जिससे उत्पादन अस्थिर रहता है। नई कृषि तकनीक, उन्नत बीज या सरकारी योजनाओं की जानकारी कई किसानों तक सही समय पर नहीं पहुंच पाती। इससे उत्पादकता कम रहती है। बाजार व्यवस्था की कमजोरियों और बिचौलियों के दबाव के कारण किसान अपनी उपज का सही मूल्य पाने से वंचित रह जाता है। अब समय आ गया है कि कृषि नीति को केवल नकद सहायता और तात्कालिक राहत तक सीमित न रखा जाए। फसलों का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित किया जाए। कर्जमाफी दर्द का पुख्ता इलाज नहीं बल्कि दर्द निवारक दवा की तरह है। स्थायी समाधान तभी संभव है जब खेती को लाभकारी और टिकाऊ बनाया जाए। तभी देश का अन्नदाता वास्तव में समृद्ध हो सकेगा।




