National Human Rights Commission : नई दिल्ली। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की अध्यक्षता में यहां आयोजित एक सत्र में शैक्षणिक संस्थानों के परिसरों में रैगिंग रोकने के उपायों के तहत स्वास्थ्य एवं समावेशी केंद्र बनाने, संस्थानों से सबूत और जवाबदेही तय किए जाने के साथ वार्षिक रैगिंग रोधी रिपोर्ट मंगाने तथा शिकायतों को जिला प्रशासन की मंजूरी के बिना बंद न किए जाने के सुझाव दिए गए। बैठक की अध्यक्षता करते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) वी. रामसुब्रमण्यन ने उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की।
आयोग द्वारा बृहस्पतिवार को जारी एक बयान के अनुसार, उन्होंने कहा कि कई कानूनों, नियमों, समितियों और 2001 के दिशा-निर्देशों, आर. के. राघवन समिति और 2009 के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) नियमों के बावजूद, उनका पालन कराना “एक बड़ी चुनौती” बना हुआ है। एनएचआरसी प्रमुख ने “किसी भी तरह की रैगिंग को रोकने के लिए मजबूत निगरानी तंत्र” बनाने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने पीड़ितों की सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करने के लिए कानूनों को लागू करने, शिकायतों के निपटारे में “अधिक संवेदनशीलता” और शिकायतकर्ताओं की “पहचान उजागर न होने देने” की आवश्यकता पर बल दिया। एनएचआरसी के अनुसार, विभिन्न हितधारकों की सक्रिय भागीदारी से हुई चर्चा में कई सुझाव रखे गए हैं, जिनमें हर संस्थान की वेबसाइट पर यूजीसी की रैगिंग रोधी हेल्पलाइन का नंबर प्रदर्शित करना; अनिवार्य रूप से तत्काल पुलिस को सूचना देना; रैगिंग रोधी समितियों में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग/अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व; और शिकायत के बाद पीड़ित की सुरक्षा सुनिश्चित करना शामिल हैं।
अन्य सुझावों में नियमित ऑडिट, औचक निरीक्षण, सीसीटीवी निगरानी और परिसरों में पुलिस का निरीक्षण; प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मौजूदगी में ‘वेलनेस’ और ‘इंक्लूजन’ सेंटर स्थापित करना; जिला प्रशासन की मंजूरी के बिना शिकायतों को बंद न करना; तथा संस्थानों से सबूत और जवाबदेही तय किए जाने के साथ रैगिंग को लेकर वार्षिक रैगिंग रोधी रिपोर्ट मंगाना शामिल हैं।