राजेश कसेरा, वरिष्ठ पत्रकार एवं समसामयिक विशेषज्ञ
भारत को दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका ने टैरिफ का टेरर दिखाकर भले दबाव में लेने का रणनीतिक दांव खेला। लेकिन अमेरिका की इस धमकी ने भारत को कहीं न कहीं आईना दिखाने का काम भी किया। देश के कर्णधारों और आमजन तक को यह अनुभव हो गया कि दुनिया से लड़ना है तो पहले खुद को ताकतवर बनाना होगा। खासकर आर्थिक मोर्चे पर इतना मजबूत बनना होगा कि दुनिया के सारे आर्थिक फैसले भारत को केन्द्र में रखे बिना पूरे नहीं हो पाए। इसका कड़वा अनुभव देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी हो गया। तभी तो उन्होंने हाल में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान दिल्ली के लाल किले से आत्मनिर्भर भारत को बनाने का आह्वान किया। उन्होंने देश के छोटे दुकानदारों और कारोबारियों से अपील की कि वे स्वदेशी या मेड इन इंडिया के बोर्ड लगाएं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि हमें आत्मनिर्भर बनने की जरूरत है, लेकिन हताशा में नहीं बल्कि खुद पर गर्व करते हुए। दुनिया भर में आर्थिक स्वार्थ बढ़ रहा है और हमें अपनी मुश्किलों का रोना नहीं रोना चाहिए। हमें इनसे ऊपर उठकर दूसरों के चंगुल से बचना होगा। इसी भावना को उन्होंने बिहार और फिर गुजरात में ईवी प्लांट के उद्घाटन के दौरान भी व्यक्त किया। उनके इन बयानों ये ये साफ दिखा वे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लगाए 50 फीसदी टैरिफ का जवाब दे रहे हैं और देश के 140 करोड़ नागरिकों को केन्द्रित करके अपील कर रहे हैं। मोदी को आने वाले दिनों की चुनौतियां दिख गईं कि टैरिफ के कारण देश में निर्यात करने वाले उद्योगों में काम करने वाले लाखों लोगों के रोजगार प्रभावित होंगे। इससे बड़े पैमाने पर देश की आर्थिक समृद्धि को आघात पहुंचेगा, पर उन्होंने इस संकट का समाधान देश के छोटे व्यापारियों और कारोबारियों के जिम्मे यह कहकर छोड़ा कि अपने उत्पादों को भारत में बनाओ और यहीं पर उनको खर्च भी करो। भारत की जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी लंबे समय से 15 फीसदी के आंकड़े पर टिकी है। वर्षों से सब्सिडी और प्रोडक्शन इंसेंटिव देने की नीति जारी रखने के बावजूद इसकी हिस्सेदारी बढ़ाने का लक्ष्य मुश्किल होता जा रहा है।
इस पर विशेषज्ञों ने भी बताया कि अगर सरकार लंबे समय से अटके टैक्स सुधारों को आगे बढ़ाकर लोगों के हाथों में ज्यादा पैसा डाले तो ट्रंप से मिले इस झटके को कुछ हद तक कम करने में मदद मिल सकती है। यही कारण रहा कि इस साल की शुरुआत में बजट में लगभग एक लाख करोड़ रुपये की इनकम टैक्स छूट की घोषणा की गई थी। इसके बाद मोदी सरकार ने भारत के अप्रत्यक्ष कर ढांचे में बड़ा परिवर्तन का लक्ष्य बना लिया है। इसमें जीएसटी में कमी और टैक्स के सरलीकरण जैसे प्रमुख लक्ष्यों को शामिल किया है। आठ साल पहले लागू हुए जीएसटी ने कई तरह के अप्रत्यक्ष करों को सामप्त कर दिया था, ताकि टैक्स कंप्लायंस बढ़े और बिज़नेस करने की लागत कम हो। लेकिन इससे सारा तंत्र बेहद जटिल हो गया और इसमें सुधार की मांगें लगातार उठती रहीं। यही कारण है कि वित्त मंत्रालय ने जीएसटी के लिए केवल दो स्लैब का प्रस्ताव रखा।
आयकर में कटौती और जीएसटी स्लैब में सुधार के बाद उपभोक्ताओं के हाथ में लगभग दो लाख करोड़ रुपये आने की उम्मीद है। इससे उपभोग को बढ़ावा मिलेगा, क्याेंकि देश में निजी उपभोग अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है और जीडीपी में इसका 60 फीसदी योगदान है।
इसी प्रकार देश के नीति निर्माता और राजनयिक मिलकर काम करें तो आज का टैरिफ टेरर कल के बड़े बदलाव का कारण बन सकता है। अर्थशास्त्रियों की मानें तो भारत इस निर्णायक क्षण का उपयोग मेक इन इंडिया 2.0 को गति देने, सप्लाई चेन को मजबूत करने और निर्यात बाजारों में विविधता लाने के लिए कर सकता है। मैन्यूफैक्चरिंग बेस का विस्तार करने की दिशा में तेजी से काम होगा तो 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य भी हासिल हो जाएगा और भारत दुनिया का लीडर होगा।
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