Delhi High Court: दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘स्थगन की संस्कृति’ की आलोचना करते हुए कहा है कि अंधाधुंध तरीके से स्थगन का अनुरोध किया जाता है और यह सोचना गलत है कि अनुरोध करने पर मामले में स्थगन प्रदान कर दिया जाएगा. न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा एक मामले में वकील के अनुपस्थिति रहने के लिए लगाए गए 20,000 रुपये के जुर्माने को माफ करने के अनुरोध वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी.
याचिकाकर्ता की तरफ से दी गई थी ये दलील
यह जुर्माना पिछले साल मई में हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ द्वारा लगाया गया था. हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील पर गौर किया कि उसकी वकील अधीनस्थ अदालतों में अन्य मामलों में व्यस्त होने के कारण इस मामले में पेश नहीं हो सकीं. याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि उनकी वकील दो बच्चों की एकल मां हैं और उन्हें ‘अपने जीवन में कई कठिनाइयों’ का सामना करना पड़ रहा है.
‘अदालतों में समय के साथ स्थगन की एक संस्कृति विकसित हो गई है’
अदालत ने 10 दिसंबर के एक आदेश में कहा, ‘दुर्भाग्य से, अदालतों में समय के साथ स्थगन की एक संस्कृति विकसित हो गई है और यह गलत धारणा बन गई है कि मामला चाहे जो भी हो, अनुरोध करने पर स्थगन प्रदान किया जाएगा.’ इसमें कहा गया कि प्रतिवादी के वकील या अदालत के समय का कोई ध्यान रखे बिना अंधाधुंध तरीके से स्थगन का अनुरोध किया जा रहा है.
अदालत ने माफ किया 20 हजार का जुर्माना
अदालत ने कहा, ‘याचिकाकर्ता की वकील अपनी अनुपस्थिति को निजी समस्या बताकर उचित ठहराने की कोशिश कर रही हैं, जबकि वास्तव में यह किसी अन्य मामले में पेशेवर व्यस्तता के कारण था. यह निजी समस्या नहीं है, जैसा कि वह ज़ोर-शोर से तर्क दे रही हैं।’ अदालत ने कहा, ‘उम्मीद है कि स्थगन का अनुरोध करने की यह संस्कृति समय के साथ बदल जाएगी और 20,000 रुपये का जुर्माना माफ किया जाता है.’




