प्रतीक चौवे, संपादक
Budget 2026 : चिंता दूर करने वाला भी एक बजट होना चाहिए। सुकून का बजट वही होता है जिसमें महंगाई की मार थमे। रसोई का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और इलाज का डर परिवारों की नींद न छीने। टैक्स देने वाला खुद को ठगा नहीं, बल्कि व्यवस्था का सम्मानित हिस्सा महसूस करे। किसान के लिए सुकून तब है जब फसल का दाम बाजार नहीं, मेहनत तय करे। बेरोजगार युवा के लिए सुकून तब है जब उसे हर बजट में नई योजना नहीं, बल्कि स्थायी रोज़गार मिले।
बुज़ुर्गों के लिए सुकून तब है जब पेंशन और दवाइयां चिंता का कारण न बनें। जीडीपी के आंकड़े बढ़ते हैं, पर घरों का तनाव नहीं घटता। सुकून तभी आएगा जब बजट का केंद्र इंसान होगा, सिर्फ अर्थव्यवस्था नहीं। आमदनी बढ़े या न बढ़े, खर्च लगातार बढ़ रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य अब जरूरत नहीं, बोझ बनते जा रहे हैं। ऐसे में नीतियों का पहला उद्देश्य यह होना चाहिए कि नागरिक को हर महीने हिसाब जोड़ते हुए घबराना न पड़े। युवा मेहनत करने को तैयार हैं, लेकिन उन्हें भरोसेमंद अवसर नहीं मिलते। बार-बार नई योजनाओं की घोषणा से बेहतर है कि स्थायी नौकरियां पैदा हों, ताकि भविष्य को लेकर डर कम हो।
किसान की मुश्किल सिर्फ फसल उगाना नहीं, उसे उचित दाम दिलाना है। मजदूर की मुश्किल सिर्फ काम नहीं, सम्मानजनक मजदूरी है। बुज़ुर्गों की मुश्किल सिर्फ उम्र नहीं, इलाज और सुरक्षा है। जब तक नीतियां इन बुनियादी सच्चाइयों को नहीं समझेंगी, तब तक राहत अधूरी रहेगी। आम आदमी यह नहीं पूछता कि जीडीपी कितनी बढ़ी, वह यह देखता है कि महीने के आख़िर में जेब में क्या बचेगा। गैस सिलेंडर सस्ता हुआ या नहीं, बच्चों की पढ़ाई का खर्च संभलेगा या नहीं, इलाज कराते समय कर्ज़ तो नहीं लेना पड़ेगा, बजट का मूल्यांकन उसके लिए इन्हीं सवालों से होता है।
जब बजट महंगाई पर लगाम लगाने की बात करता है, तो आम आदमी को सुकून की उम्मीद बंधती है। जब रोजगार के ठोस अवसर बनते हैं, तो युवा को भविष्य साफ दिखता है। जब किसान को फसल का सही दाम और समय पर भुगतान मिलता है, तभी ग्रामीण भारत चैन की सांस लेता है। हर वर्ग की चिंता दूर हो, ऐसा बजट होना चाहिए। आमजन की प्राथमिकताओं का ध्यान रखा जाए और बेवजह खर्च किए जाने वाले पैसे को सही जगह काम में लिए जाएं। बजट में इसके अलावा और क्या चाहिए, विकास के साथ सुकून ही तो मांगता है आम आदमी।




