जयपुर। भाजपा नेता व जनसमस्या निवारण मंच अध्यक्ष सूरज सोनी ने “वन नेशन वन इलेक्शन” को प्रासंगिक बताते हुए कहा कि बार-बार होने वाले चुनाव और लंबी चुनावी प्रक्रिया देश और राज्य के विकास में बाधक बनती है. उन्होंने कहा कि प्रदेश में गत कांग्रेस सरकार के दौरान पंचायत चुनावों को अनावश्यक रूप से लंबा खींचे जाने के कारण राज्य में विकास कार्य गंभीर रूप से बाधित हुए. बार-बार लागू होने वाली आचार संहिता ने प्रशासनिक कार्यों को बाधित किया और आमजन को योजनाओं के लाभ से वंचित रखा.
‘एक साथ चुनाव होने से विकास कार्यों की निरंतरता बनी रहेगी’
सूरज सोनी ने कहा कि लोकसभा, विधानसभा और पंचायती राज व स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ या निश्चित समय चक्र में कराए जाने पर आचार संहिता बार-बार लागू नहीं होगीं और विकास कार्यों की निरंतरता बनी रहेगी. इसके साथ ही प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होगा और चुनावी खर्च में भी कमी आएगी. ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से सरकारें बिना चुनावी व्यवधान के अपने विकास एजेंडे पर काम कर सकेंगी. इससे दीर्घकालिक योजनाओं को गति मिलेगी और जनता को समय पर इनका लाभ मिल सकेगा.
तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर साधा निशाना
जनसमस्या निवारण मंच अध्यक्ष ने आगे कहा कि तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार ने चुनावी प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से लंबा खींचकर राज्य के विकास को बाधित किया. यह प्रशासनिक कमजोरी के साथ ही उनकी उस समय की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को भी दर्शाता है. सुशासन और विकास की निरंतरता के लिए ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ जैसे सुधारात्मक कदमों से भविष्य में ऐसी स्थिति की पुनरावृत्ति नहीं होगी और राज्य तेज गति से विकास की राह पर आगे बढ़ सकेगा.
पंचायत चुनाव वर्ष 2020 से दिसंबर 2021 तक 7 चरणों में हुए
उल्लेखनीय है कि पंचायत चुनावों को वर्ष 2020 से दिसंबर 2021 तक 7 चरणों में आयोजित किया गया था. इस प्रकार यह चुनावी प्रक्रिया लगभग दो वर्षों तक चली और राज्य में बार-बार आचार संहिता होने से विकास योजनाओं की स्वीकृति और कार्यान्वयन प्रभावित हुए. कांग्रेस शासनकाल में चुनावों को लंबे समय तक खींचने से प्रशासनिक तंत्र चुनावी कार्यों में उलझा रहा और विकास की गति धीमी पड़ गई. इस अवधि में ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य आधारभूत सुविधाओं से जुड़े अनेक कार्य प्रभावित हुए. नई योजनाओं की घोषणाएं टलती रहीं और स्वीकृत परियोजनाओं का क्रियान्वयन बाधित हुआ. अधिकारियों और कर्मचारियों को बार-बार चुनावी ड्यूटी में लगाए जाने से शासन-प्रशासन की कार्यक्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा.



