Saturday, January 17, 2026
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Al Falah University Case : ईडी ने कसा शिकंजा, अल-फलाह ने लालकिला विस्फोट से जुड़े चिकित्सकों को बिना पुलिस जांच के नियुक्त किया था

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में खुलासा हुआ है कि फरीदाबाद स्थित अल-फलाह विश्वविद्यालय ने बिना किसी पुलिस सत्यापन के तीन डॉक्टरों की नियुक्ति की थी, जिनमें से दो को एनआईए ने आतंकी मामलों में गिरफ्तार किया है और तीसरा लालकिला विस्फोट का कथित आत्मघाती हमलावर था। ईडी ने विश्वविद्यालय और ट्रस्ट पर धनशोधन, फर्जी नियुक्तियों और नियामक एजेंसियों को गुमराह करने का आरोप लगाया है।

Al Falah University Case : नई दिल्ली। फरीदाबाद स्थित अल फलाह विश्वविद्यालय ने अन्य विशेषज्ञों सहित तीन चिकित्सकों की नियुक्ति बिना किसी पुलिस जांच या सत्यापन के की थी। इन तीन चिकित्सकों में से दो को राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) ने गिरफ्तार किया है और तीसरा लालकिला के पास नवंबर 2025 में हुए धमाके का कथित आत्मघाती हमलावर था। प्रवर्तन निदेशालय की जांच से यह जानकारी सामने आयी है। समझा जाता है कि विश्वविद्यालय के प्रवर्तक के खिलाफ धनशोधन मामले की जांच के तहत एजेंसी ने विभिन्न वरिष्ठ अधिकारियों और शिक्षकों के बयानों को दिल्ली की अदालत में शुक्रवार को दाखिल आरोपपत्र में संलग्न किया है।

अल फलाह मेडिकल कॉलेज ईडी जांच

अल फलाह समूह के अध्यक्ष जवाद अहमद सिद्दीकी (61) और विश्वविद्यालय के सभी शैक्षणिक संस्थाओं को नियंत्रित करने वाले अल फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) धाराओं के तहत दर्ज शिकायत में दो आरोपियों के रूप में नामजद हैं। लगभग 260 पन्नों के आरोपपत्र में सिद्दीकी और उनके ट्रस्ट पर छात्रों द्वारा भुगतान की गई फीस से अवैध धन जुटाने और साथ ही अपने संस्थानों की मान्यता और प्रमाणन के बारे में कथित रूप से गलत जानकारी देने के आरोप में मुकदमा चलाने का अनुरोध किया गया है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने शुक्रवार को जारी एक बयान में कहा कि उसने विश्वविद्यालय की जमीन और इमारत को अस्थायी रूप से जब्त कर लिया है, यह संपत्ति लगभग 140 करोड़ रुपये की है और फरीदाबाद के धौज इलाके में स्थित है।

अभी तक अदालत ने ईडी के आरोपपत्र पर संज्ञान नहीं लिया है। अधिकारियों ने ईडी के आरोपपत्र का हवाला देते हुए ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर सिर्फ कागजों पर ही नियुक्त थे। अधिकारियों ने बताया कि उन्हें ‘22 दिन पंच’ या ‘सप्ताह में दो दिन’ की शर्त के तहत नियमित शिक्षक के रूप में दिखाया गया, ताकि राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) से जरूरी मंजूरी हासिल की जा सके और स्वास्थ्य सुविधा देखभाल इकाई बिना किसी बाधा के चलती रहे। अधिकारियों के अनुसार, ईडी ने विश्वविद्यालय रजिस्ट्रार का बयान दर्ज किया है, जिन्होंने जांच एजेंसियों के परिसर दौरे और विश्वविद्यालय अस्पताल से जुड़े ‘डॉ. मुज़म्मिल और डॉ. शाहीन’ की गिरफ्तारी को स्वीकार किया। उन्होंने अपने बयान में कहा कि 2019 में स्थापित मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों को ‘‘बिना किसी पुलिस सत्यापन के नियुक्त किया गया था।”

बिना पुलिस सत्यापन डॉक्टर नियुक्ति मामला

विश्वविद्यालय की कुलपति और प्राचार्य ने ईडी को बताया कि जो डॉक्टर आतंक से जुड़े मामलों में कथित तौर पर शामिल बताए जा रहे हैं, वे सभी उनके कार्यकाल में नियुक्त किए गए थे। इनमें अक्टूबर 2021 से जनरल मेडिसिन विभाग में जूनियर रेजिडेंट डॉ. मुजम्मिल गनई, अक्टूबर 2021 से फार्माकोलॉजी में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शाहीन सईद और कथित आत्मघाती बम धमाके में शामिल और मई 2024 से जनरल मेडिसिन में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. उमर नबी शामिल हैं। उन्होंने एजेंसी को बताया कि इन नियुक्तियों की सिफारिश विश्वविद्यालय के मानव संसाधन प्रमुख ने की थी और इन्हें सिद्धिकी ने मंजूरी दी थी, जिसके बाद उन्होंने औपचारिक नियुक्ति पत्र जारी किए। समझा जाता है कि कुलपति ने ईडी को यह भी बताया कि इन डॉक्टरों की नियुक्ति के समय ‘‘कोई पुलिस जांच या सत्यापन’ नहीं किया गया।”

पिछले साल 10 नवंबर को दिल्ली के लालकिला के पास विस्फोटक से भरी कार में धमाका होने से 15 लोग मारे गए थे और कई घायल हो गए थे।। बताया गया कि कार चला रहा डॉ. उमर नबी इस विस्फोट में मारा गया, जबकि डॉ. मुज़म्मिल गनई और सईद को एनआईए ने गिरफ्तार किया। आरोपपत्र में एक दस्तावेज में डॉ. उमर नबी का नाम मेडिकल इकाई के नियमित डॉक्टर के रूप में भी शामिल है। सिद्धिकी ने एजेंसी के सामने अपने बयान में कहा कि उनका किसी आतंकवादी या प्रतिबंधित संगठन से “कोई संबंध” नहीं है। प्रवर्तन निदेशालय पीएमएलए की धारा 50 के तहत धनशोधन जांच में विभिन्न व्यक्तियों के बयान दर्ज करता है और ऐसे बयान अदालत के समक्ष स्वीकार्य होते हैं। अधिकारियों ने बताया कि एजेंसी ने अल-फलाह विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों और फैकल्टी के बयान दर्ज किए हैं। आरोप है कि मेडिकल कॉलेज में विशेषज्ञ जो ‘पेरोल’ पर थे, वे दस्तावेजों में “कागजों पर चिकित्सक”, “22 दिन पंच” और “सप्ताह में दो दिन” के रूप में सूचीबद्ध थे, लेकिन वास्तव में वे कॉलेज नियमित रूप से नहीं आते थे, ना तो कक्षा लेते थे और ना ही मरीजों का उपचार करते थे।

फर्जी डॉक्टर नियुक्ति एनएमसी

ईडी का दावा है कि “कागज पर डॉक्टर” केवल एनएमसी की मंजूरी और अन्य नियामक निरीक्षणों को पूरा करने के लिए नियुक्त थे। ईडी के अनुसार, मेडिकल कॉलेज के “कागजों पर नियुक्त कर्मचारियों” को अपने पद और शर्तों के बारे में पूरी जानकारी थी और उनकी नियुक्ति सिद्धिकी के “नियंत्रण” में थी। ईडी के अनुसार, कुछ को उन्होंने “फर्जी” कार्य अनुभव प्रमाण पत्र भी दिए। एजेंसी ने पाया कि सिद्धिकी ने जून 2025 में मेडिकल कॉलेज की अंतिम एनएमसी जांच के दौरान भी एनएमसी को धोखा देना जारी रखा। इसके बाद कॉलेज को एमबीबीएस सीट 150 से 200 तक बढ़ाने की अनुमति दी गई।

ईडी ने निष्कर्ष निकाला कि कई डॉक्टर केवल नियामक निरीक्षण की जरूरत के लिए अस्थायी तौर पर नियुक्त किए गए थे और अल-फलाह मेडिकल कॉलेज में काम करने वाले डॉक्टरों के रोजगार की शर्तें भी कई तरह से फर्जी थीं। आरोपपत्र में संलग्न कुछ दस्तावेज और वीडियो चैट से पता चलता है कि एनएमसी निरीक्षण से लगभग तीन हफ्ते पहले अस्पताल में मरीज, स्टाफ या डॉक्टर मौजूद नहीं थे। इसमें कहा गया है कि साथ ही चैट और रिकॉर्ड से यह भी पता चला कि निरीक्षण से पहले “फर्जी” मरीज भर्ती किए गए थे। ईडी का दावा है कि सिद्धिकी ने इस धनशोधन मामले में प्रमुख भूमिका निभायी। एजेंसी ने दावा किया कि इस मामले में कथित अपराध से प्राप्त राशि के 493.24 करोड़ रुपये होने का पता चला है, जो छात्रों से वार्षिक ट्यूशन और परीक्षा शुल्क के रूप में वसूल की गई। उम्मीद है कि एजेंसी अतिरिक्त आरोपपत्र दाखिल करेगी क्योंकि वर्तमान जांच में विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति केवल मार्च 2025 तक शामिल की गई है और अवैध धन की राशि बढ़ने का अनुमान है।

Mukesh Kumar
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